इसलिए कि मेरे ये शब्द,
मैं उनको समझा सकूँ,
कि मैं क्या सोचता हूँ,
उनके बारे में,
मालूम नहीं,
कब बन्द हो जाये,
मेरी यह जुबां-ए-दिल,
अगर कल तक मैं,
जिन्दा नहीं रह सका।
इसलिए मैं,
आज लिख रहा हूँ,
ताकि उनको तकलीफ़ ना हो,
मुझको तलाशने में,
इसलिए रख जा रहा हूँ मैं,
इतने ग्रन्थ पुस्तकालय में,
ताकि वो पहचान सके,
अपने आपको,
और मेरी जुबां-ए-जिंदगी।
मैं कौन हूँ, वो कौन है,
ऐसा समझ सके वो,
उनको कोई अफसोस नहीं हो,
इसलिए बना रहा हूँ मैं,
एक मकान,
ताकि कल वो,
पा सके पनाह,
और सनाह,
मेरी सराय में।
– गुरुदीन वर्मा (आज़ाद)
तहसील एवं जिला- बारां (राजस्थान)