मनोरंजन

ग़ज़ल – रीता गुलाटी

मिन्नतें वो हजार करता है।

प्यार भी बेशुमार करता है।

 

मिल न पायी तुझे मैं तसुव्वर मे।

ख्याब पर अब तू वार करता है।

 

हम जियें यार क्यो बिना तेरे।

क्योंकि दिल तुमसे प्यार करता है।

 

दे दे इक बार तू निगेहबानी।

दिल तुम्हें प्यार यार करता है।

 

दिल मेरा चाह बस तेरी करता।

गुफ्तगू पर विचार करता है।

 

यार कैसे जियें अकेले हम।

प्यार अब बेशुमार करता है।

 

लड़ रहे हैं घर मे आज क्यो भाई।

हाय क्यो भाई खार करता है।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़

Related posts

“मौन की मुस्कान” – चुप्पियों के शब्दों में गूंजती स्त्री की आत्मा – ✍️ डॉ. पूर्णिमा, अमृतसर

newsadmin

जिन्दगी – प्रतिभा कुमारी

newsadmin

उधम सिंह सरदार – डॉ सत्यवान सौरभ

newsadmin

Leave a Comment