मनोरंजन

प्रीत – सविता सिंह

वो दो ऑंखें तुम्हारी

पीठ पर ही जमी हुई।

हो गई है एक सदी

पीठ के बल सोई नहीं।

यूँ ही करवट सोते हुये

बीत गया जमाना,

ना जाने उन अँखियों से

कब होगा सामना।

स्यात मदन तुम पढ़ लेते

आकर मेरी आँखों को।

तो यूँ ना हम करवट में सोते

कई सदी से रातों को।

अब मौन ही रह गई प्रिये

हमारी ये कहानी।

प्रीत पर निभाई है

हमने तो बेजुबानी।

– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

Related posts

हिंदी समाचार पत्र के प्रतिनिधि धन्य है जो हिंदी का परचम फहराये हुए है : संगम त्रिपाठी

newsadmin

अगहन (मार्गशीर्ष) – मुकेश कुमार दुबे

newsadmin

गजल. – रीता गुलाटी

newsadmin

Leave a Comment