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दोहा गजल – अनिरुद्ध कुमार

 

बैठा मानव सोंचता, यह धरती है गोल,
हर कोई ज्ञानी यहाँ, पीट रहा है ढ़ोल।

श्री मुख से नित बोलता दिन हो चाहे रात,
मन उदगार उढ़ेलता, मीठे तीते बोल।

तन-मन सुंदर मोहता, मनभावन हर बात,
अपनी ही सोचें सदा, रह रह बोले तोल।

कोई जलता द्वेश से, कोई करता घात,
कोई कहता प्यार से, लागे मधुका घोल।

प्यारा ये जीवन लगे, रिश्ते नाते तात,
जो जैसा है आदमी, समझे अपना मोल।

भावों की सरिता बहे, हँस रो करता बात,
रटता कैसी जिंदगी, नित बोले मुख खोल।

अपनी अपनी जिंदगी, भावों की बरसात,
‘अनि’ भी इसमें जी रहा, जीवन है अनमोल।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह,, धनबाद, झारखंड।

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