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मेरी माँ – सुनील गुप्ता

( 1 ) मेरी माँ

रहीं प्रेरणा स्रोत सदा,

जीवनभर हमें यहाँ सिखलाया  !

” माँ “,थी अनुभव की अनंत आसमां.,

और जीने का गुर और पाठ पढ़ाया  !!

( 2 ) मेरी माँ

दया प्रेम की मूरत,

“माँ”, की ममता थीं अप्रतिम  !

जीवन की हरेक विकट परिस्थितियों में….,

सदैव खिलता रहा उनका शुभानन !!

( 3 ) मेरी माँ

लगन धुन की पक्की,

धैर्य संतोष था उनमें अथाह  !

मुस्कुराकर मिलती थी सबसे ” माँ “..,

करती न थी कभी कोई चिंता परवाह !!

( 4 ) मेरी माँ

थीं सच्ची एक कर्मयोगिनी,

उत्साह उमंग लगन से सराबोर  !

जीवन के हरेक उतार चढ़ाव को देखे ..,

परख चलीं बाँटती खुशियाँ चहुँओर !!

( 5 ) मेरी माँ

रहीं लिपटी प्रेमलता सी,

बांटती चलीं प्रेम स्नेह प्यार  !

और रहीं हमेशा यहाँ पे मुस्कुराती…,

चलीं लुटाती सभी पे ममत्व दुलार !!

( 6 ) मेरी माँ

बसी श्वासों में मेरे,

मन अंतस की अटल गहराईयों में  !

अहसास करूँ उनकी हर पदआहट का..,

वह बसी हैं मन के कानन उपवन में !!

( 7 ) मेरी माँ

की प्रेममयी मूरत को,

नित करता चलूँ नमन वंदन प्रणाम   !

मेरे कानन में खिले सुंदर पुष्पों की महक…,

सदा देतीं चलें माँ के आगमन का पैगाम  !!

सुनील गुप्ता (सुनीलानंद), जयपुर, राजस्थान

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