मनोरंजन

हिंदी गजल – राजू उपाध्याय

उस फुटपाथी जीवन की कब तक सुबह सुनहरी होगी.!

दर्दों की सुनवाई पे, कब तक कोर्ट कचहरी होगी…!

 

छत आकाशी, बिस्तर धरती, जिनके  हिस्से घोर अंधेरे,

उन  गलियों  में कब  तक, उजली, कोई दुपहरी होगी..!

 

रोज-रोज जो नित उगते सूरज, राजनीति के मंडप में,,

ढूंढो उनको  देखो  शायद, धूप वही  पर  ठहरी होगी..!

 

सर्दी गर्मी  फटते बादल, हर आफत संग, जीना मरना,,

विषधर दंश चुभे तो लगता,शायद कोई गिलहरी होगी…!

 

आजादी का सूरज कब तक चमकेगा दूर अंधेरों तक,,

घास फूस बाले उस घर में कब तक,कोई मसहरी होगी…!

 

पीड़ाओ के दरबार सजे,पर सत्य यहां क्रंदन करता है,,

जो दर्द न जाने मजलूमों का,वो सत्ता गूंगी बहरी होगी…!

 

कर्ण भेदिनी गूंजो के संग,कर्कश शोर मचा है कैसा,,

अप-शकुनी आभास कराती,शायद,बोली कोई टिटहरी होगी..!

 

कच्चे घर की छत गिरी तो वो आंखें फफक-फफककर रोई,,

मौसम से मिट जाने की,वो पीड़ा कितनी गहरी होगी…!

– राजू उपाध्याय एटा , उत्तर प्रदेश

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