इससे पहले कि धधक उठे
हर हिन्दू हृदय में ज्वाला
इससे पहले हाथों में हों
तलवार धनुष बर्छी भाला
इससे पहले कि सब्र-बाँध
अपने तटबंधों को तोड़े
इससे पहले गंगा का तट
लहू के फब्बारे छोड़े
इससे पहले कि सप्तसिंधु
बड़वाग्नि सुखाने लग जाए
इससे पहले कि रणचंडी
अपनी तंद्रा से जग जाए
अगर नहीं तो प्रत्यंचा पर फिर से बाण जरूरी है
काशी, मथुरा में मंदिर का हो निर्माण, जरूरी है
इतिहासों से परिचित होगा
नहीं विरोधी मंदिर का
चाहे मुसलमान या हिन्दू
कब अवरोधी मंदिर का
सर आँखों पर बिठा रहे जो
आक्रांता अति पापी को
धर्म-दलालों की समझोगे
कब शातिर चालाकी को
इससे पहले इन आँखों में
खूनी प्रतिशोध उतारे हम
प्राणों की आहुति दे डालें
निज शीश देव पर वारें हम
कंकर-कंकर में शंकर तब, कैसा प्रमाण जरूरी है
काशी, मथुरा में मंदिर का हो निर्माण, जरूरी है
इससे पहले उठ कर्तिकेय
ले धनुष हाथ टंकार करें
इससे पहले प्रभु एकदंत
अति उग्र बनें, ललकार करें
इससे पहले आच्छादित हो
अस्त्रों शस्त्रों से व्योम धरा
इससे पहले कि पता चले
बजरंगबली को बात ज़रा
इससे पहले शिव-गण नाचें
विषधर फुंकार चलें आएं
इससे पहले क्रोधित नंदी
सींगों को अपने टकराएं
वसुंधरा पर जीवों का किंचित कल्याण जरूरी है
काशी, मथुरा में मंदिर का हो निर्माण, जरूरी है
हरि हर की पावन भूमि यहां
छोड़ो तुम अपनी जिद भाई
अन्यंत्र वजू कर लो जाकर
वहाँ बनवाओ मस्जिद भाई
है प्रश्न आस्था का अपनी
वरना तो दान करा देते
एक नहीं हम सौ मस्जिद
फौरन निर्माण करा देते
इससे पहले शिव त्रिपुरारी
वीभत्स तांडव कर डालें
इससे पहले त्रिनेत्र खुलें
जलमग्न धरा सब कर डालें
श्रेष्ठ सनातन भूमि यहां होना परित्राण जरूर है
काशी, मथुरा में मंदिर का हो निर्माण, जरूरी है
धैर्य सनातन देख लिया
जाने कितने ही वर्षों से
किन्तु नहीं बच सकते हो
प्रभु परशुराम के फरसों से
इससे पहले कि धरा अंक
लाशों मुंडों से पट जाए
इससे पहले नभ थर्राए
धरती का कलेजा फट जाए
इससे पहले कि सूर्य चंद्र
उदगन अंगारे बन जाएं
इससे पहले कि गिद्ध स्वान
लोथों पर आकर मढ़राएं
अब आह्वान जरूरी है, हाँ प्रयाण जरूरी है
काशी, मथुरा में मंदिर का हो निर्माण, जरूरी है
काशी, मथुरा में मंदिर का हो निर्माण, जरूरी है
काशी, मथुरा में मंदिर का हो निर्माण, जरूरी है
– भूपेन्द्र राघव. खुर्जा, उत्तर प्रदेश