मनोरंजन

ग़ज़ल – विनोद निराश

जख्मे-दिल मेरे हरे के हरे रह गए।

सारे हसीं ख्वाब धरे के धरे रह गए।

 

कुछ इस तरहा हुई थी विदाई उनकी,

लरजते होंठ सीले के सीले रह गए।

 

वक्ते-रुखसत का मंज़र क्या बतायें,

आँखों के कोरे भरे के भरे रह गए।

 

साथ जीने मरने की कसम खाईं मगर,

उनके जाने के बाद मरे के मरे रह गये।

 

हम तो इश्क़ करके भी रुसवा हुए और,

साथ छोड़ने वाले खरे के खरे रह गए।

 

अब अपनी बेगुनाही का सबूत क्या दे,

आँखों से अश्क झरे के झरे रह गए।

 

वो कहकशाँ की जानिब बढ़ते ही गए,

हम मूकदर्शक खड़े के खड़े रह गए।

 

अजीब रस्म है उम्र बढ़ने की निराश,

कुछ उम्रे-रवानी से डरे के डरे रह गए।

– विनोद निराश, देहरादून

(29 अक्टूबर बृहस्पतिवार 2026 (करवाचौथ)

जख्मे-दिल – ह्रदय के घाव / दिल के जख्म

लरजते – काँपते / थरथराते

वक्ते-रुखसत – अंत काल / आखिरी समय

रुसवा – बदनाम / शर्मिंदा

अश्क – आँसू

कहकशाँ – आकाश गंगा / सितारों का झुरमुट / छायापथ / मंदाकिनी / देवलोक को जाने वाला पथ

जानिब – तरफ / ओर

मूकदर्शक – चुपचाप

उम्रे-रवानी – बीता हुआ जीवन / क्षणभंगुर जीवन / बहती या बीतती ज़िंदगी

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