जीवन का सफर
तय तो सभी करते हैं
कोई हँसकर, कोई रोकर
मधु की चाह में
भटकता हुआ मन
न जाने कितनी बार
करता है विषपान
कुछ पाने की चाह में
बार बार सहता हैं अपमान
मुस्कराते चेहरों के पीछे
छिपी हैं कितनी पीड़ाएँ
तिल-तिल कर जल रहीं हैं
अरमानों की ज्वालाएं
ओह मानव !
फिर भी स्वीकारता है क्रन्दन
जन्म और मृत्यु का
करता है अभिनन्दन!
– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश