मनोरंजन

औरत – रुचि मित्तल

तुमने उसे देखा है

कभी माँ की तरह

कभी पत्नी की तरह

कभी बेटी की तरह

लेकिन..

कभी इंसान की तरह नहीं।

तुम कहते हो वो रोती क्यों है?

वो चुप क्यों नहीं रहती?

वो सवाल क्यों करती है?

क्योंकि…

उसकी चुप्पी में सदियों का शोर है,

उसकी आँखों में

हज़ार बार मारा गया आत्मसम्मान है।

वो सुबह उठती है सबसे पहले,

और रात सोती है सबसे आख़िर में

फिर भी उसे कहा जाता है

कि वो करती क्या है?

उसके शरीर पर फ़ैसले तुम्हारे,

उसके कपड़ों पर नज़रें तुम्हारी,

उसकी हँसी पर शक तुम्हारा,

और…

उसकी ख़ामोशी पर भी इल्ज़ाम तुम्हारा।

जब वो जलती है तो कहा जाता है

संस्कार की कमी थी।

जब वो झुकती है तो कहा जाता है

औरत ही ऐसी होती है।

तुम्हें क्या पता

रोज़-रोज़ मरना कैसा होता है

ज़िंदा रहते हुए।

हर रिश्ते में थोड़ा-थोड़ा टूटना

और फिर भी मुस्कुराते रहना।

जिस दिन तुम्हारी हाँ

किसी और की इजाज़त से बंधी होगी,

जिस दिन तुम्हारा “न”

कोई मायने नहीं रखेगा,

जिस दिन तुम्हें हर कदम पर

डर के साथ जीना पड़ेगा

उस दिन समझोगे।

पुरुष क्या समझे स्त्री का दर्द…

स्त्री होंगे…

तो जानोगे।

-रुचि मित्तल, झज्जर , हरियाणा

 

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