आ पहुँचे हैं गाँव तक, छल-कपटी अंदाज़।
नफ़रत के ताबीज अब, बाँट रहे सरताज।।
मीठे-मीठे बोलकर, करते दिल पर वार,
चेहरों पर इंसानियत, भीतर काला भार।
रिश्तों की चौपाल में, बैठा झूठ समाज—
नफ़रत के ताबीज अब, बाँट रहे सरताज।।
जाति-धर्म की आग में, जलता हर इंसान,
रोटी से भी बड़ा हुआ, अब झूठा अभियान।
भूखे पेटों से यहाँ, छीना गया अनाज—
नफ़रत के ताबीज अब, बाँट रहे सरताज।।
पहले जैसे गाँव में, प्रेम बसा बेमाप,
अब हर चौखट पूछती, किस दल का है जाप।
नेह भरे आँगन हुए, नफरत के आगाज़—
नफ़रत के ताबीज अब, बाँट रहे सरताज।।
सत्ता की खातिर यहाँ, बिकते रोज़ उसूल,
झूठी बातों के तले, दबते सच्चे फूल।
सौरभ कहे बचाइए, प्रेम भरा समाज—
नफ़रत के ताबीज अब, बाँट रहे सरताज।।
✍️ — डॉ. सत्यवान सौरभ, उब्बा भवन,
आर्यनगर, हिसार (हरियाणा) – 125005