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प्रभाती वंदन – डॉ गीता पांडेय

बढ़े-घटे तिथि वार है,शुचि पुरुषोत्तम मास।
पूजन अर्चन सब करें, मंगलमय ले आस।
तीन वर्ष के बाद में,आता यह संयोग,
भक्ति भाव उर में जगे,प्रभु के प्रति विश्वास।।

मुक्त दोष होते सभी,हरि कीर्तन जप नाम।
भक्त करें जो साधना, उनके पूरण काम।
अधिक मास में दान का, होता बहुत प्रभाव,
पुण्य मिले शुभ लाभ फल,गेंह बने सुख धाम।।

काम क्रोध मद लोभ सब, माया के ही अंग।
बढ़ते रहते ये सदा,खूब दिखाते रंग।
इनको उर पालो नहीं, हरदम रहना दूर,
जीवन सुखमय हो तभी, तन-मन रहे उमंग।।

वक्त सभी को कर रहा, प्रतिपल यही सचेत।
फिसल रही है जिंदगी,ज्यों मुट्ठी से रेत।
आशाओं की बेल पर,खिले खुशी के पुष्प,
समदर्शी शुचि भाव हों,रवि का यह संकेत।।
– डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन, रायबरेली, उत्तर प्रदेश

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