मनोरंजन

मेरे क्यों छोड़ दूँ – सुनीता मिश्रा

एक बच्चा जिन्दा है..

नही हो पाया है

जो अब तक बडा..

रहना चाहती हूँ

हमेशा बच्चा ही…

कहते हैं मुझे प्राय:

जो मिलते हैं मुझसे…

अब तो छोड दें

तू बचकानी हरकतें…

खिलखिला पडती हूँ

फिर से मैं…

सुनकर उनकी बातें

और पूछ लेती हूँ

उनसे…

क्या बडी हो जाऊंगी

छोडकर बचकानी हरकतें…?

क्या दोगे मुझे

कोई प्रतिष्ठित उपाधि…?

झुंझला कर वो पूछते हैं हमसे..

क्या हम नही हुये बडे..?

हमे क्या उपाधि मिली?

कह देती हूँ तब मैं

क्यूँ मार दूं फिर

अपने भीतर के उस बच्चे को…

जिसको मै हरपल जीना चाहती हूँ..

मचल जाती हूँ जिसे पाकर

फिर क्यों छोड़ दूँ उस बच्चे को..

जिसे प्यार है मुझसे,

मेरी अंतरात्मा से,

और मुझे उससे…

– सुनीता मिश्रा , जमशेदपुर

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