मनोरंजन

मेरा स्वयं – सविता सिंह

मैं और मेरे स्वयं की

चलती अक्सर तनातनी।

ना जाने क्यों कहती हमसे

ना करना अब मनमानी।

लिखने को कभी जो बैठे,

कलम हठीली हो जाती मौन,

भावनाएँ मन में घूमती रहती,

शब्द ना जाने हो जाते गौण।

अंतर्मन में भीषण द्वंद,

पर भला यह समझे कौन।

वह कहती क्यों करें विश्वास

बना लेती हो पल में खास ।

क्यों करती तो इतनी नादानियाँ

बांध लेती क्यों सब से यह आस।

सुन तू मुझको भी है सब खबर

क्यों समझे हमें बेखबर।

पढ़ लेती हूँ सबके मन को

फिर भी करती उनकी कदर।

मैं इतनी नहीं हूँ अनजानी

समझती हूँ किसमें कितना पानी।

चुन लेती हूँ फिर राहें नई

पर हाँ जरूर हूँ मैं स्वाभिमानी।

बस तू देती रहना दस्तक

कुटिलता कपटता ना पहुंचे हम तक।

– सविता  सिंह मीरा , जमशेदपुर

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