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मौन में अपने प्रणय को – अनुराधा पाण्डेय

लो ! हुई अब मौन चितवन ।
एक रस अब मौन मेरे ।
जी करे तो ढूंढ लेना –
#मौन में अपने प्रणय को…….
बोलने से व्यर्थ मेरे
प्रेम का अपमान होगा ।
अर्चना का पुष्प झरकर ,
अब न पथ में म्लान होगा ।
साधना कर बोध लूँगा –
अश्रु से अपने हृदय को ।
#मौन में अपने प्रणय को……..
है गलत आराधना में
पूछना भगवान कैसा ?
प्रेम चिर निर्गुण हुआ जब,
प्रेय का गुणगान कैसा ?
खोजना फिर द्वैत कैसा-
भग्न क्योँ करना विलय को ?
#मौन में अपने प्रणय को……..
अब न रजनी ही कहीं जब,
मात्र प्रेमिल रश्मियाँ हैं।
जब हृदय में मात्र मेरे ,
प्राण प्रिय की उर्मियाँ है ।
अस्त ही जब है न दिनकर –
देखना फिर क्या उदय को ?
#मौन में अपने प्रणय को…..
– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका , दिल्ली

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