क्या प्रिये !उर भग्न तरु में
कौमुदी फिर से खिलेगी?
सिन्धु मन का तिक्त बैठा ,
सूखते से राग षडरस।
जी रहा हूं दूर तुझसे,
प्रेम पथ का क्या न अपयश ?
बोल !कब तू व्यग्र सरिता –
सी समद से आ मिलेगी ?
कौमुदी फिर से खिलेगी?
एक युग से मैं तुझे हूं,
आत्म मन्दिर में सजाये।
अनवरत शुचि पाद तेरे,
अश्रु से मैंने नहाये।
पुष्प चंदन मूर्त आकर ,
हाय !क्या इक दिन न लेगी?
कौमुदी फिर से खिलेगी?
रह गये हैं चिर कुंवारे ,
धुर विरह में घाव मन के।
और छूने भी न दूँ मैं,
दूसरों को दर्द व्रण के।
ये हरे इस हेतु रक्खे-
तू इन्हें आकर सिलेगी।
क्या प्रिये!उर भग्न तरु में।
कौमुदी फिर से खिलेगी।
– अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली