चतुर्थ दिवस का शुभ प्रभात, जग में ज्योति छाई,
माँ कुष्मांडा के चरणों में, श्रद्धा शीश झुकाई।
अंडज ब्रह्मांड की रचयिता, मुस्कान में संसार,
उनकी दिव्य हँसी से ही, उजियारा अपार।
अंधकार के गर्भ से, ज्योति की राह बनाई,
शून्य में सृष्टि रच दी, ममता की छाया छाई।
अष्टभुजा में शक्ति समाई, हर संकट हरती,
सिंह सवारी माँ हमारी, दुख-बंधन सब हरती।
अमृत कलश कर में शोभित, जीवन का संचार,
भक्तों के हर कष्ट हरें, करतीं उद्धार।
सूर्य मंडल में वास तुम्हारा, तेज अपार तुम्हारा,
तुमसे ही प्राणों का स्पंदन, तुमसे जग सारा।
नव आशा की किरण जगाती, हर मन में विश्वास,
तेरे नाम का स्मरण करे, मिट जाए हर त्रास।
हे माँ कुष्मांडा दयामयी, करुणा की हो धारा,
तेरे चरणों में ही मिले, जीवन का उजियारा।
भक्ति दीप जलाऊँ ऐसा, जो कभी न बुझ पाए,
तेरी कृपा की छाया में, जीवन सफल हो जाए।
- राजलक्ष्मी श्रीवास्तव, जगदलपुर राजिम, छत्तीसगढ़