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शंकरत्व के बिना सब निर्मूल है – हरी राम यादव

 

शंकरत्व ही इस सृष्टि का मूल है।

वह ही तना पत्ती फल  फूल है।

शंकरत्व ही कृषि और विज्ञान है।

शंकरत्व ही तो अनुसंधान है।

 

शंकरत्व प्रेम अहिंसा बंधुत्व है।

शंकरत्व ही दया का मूल तत्व है।

शंकरत्व ही तो हवा और नीर है ।

शंकरत्व ही तो स्वेत क्षीर है ।

 

शंकरत्व से ही चलता समाज है।

इसके बिना सब बे-आवाज है।

शंकरत्व से सब रस का स्वाद है।

चहुं ओर शंकरत्व का निनाद है।

 

शंकरत्व के बिना न कोई रंग है।

बिना शंकरत्व हर काम भंग है।

शंकरत्व बिना न कुछ भी है बना।

शंकरत्व बिना न सृष्टि की कल्पना।

 

शंकरत्व ही कूप नदी तड़ाग है।

शंकरत्व से ही बनती हर बाग है।

शंकरत्व से ही बनते ऊंचे पहाड़ हैं।

शंकरत्व से बनती नदियों में बाढ़ है।

 

शंकरत्व है चंदन और पथ धूल है।

शंकरत्व के बिना सब  निर्मूल है।

आइए उस शंकरत्व की करें बंदना।

जिसका अर्थ है हरी बहुत ही घना ।

– हरी राम यादव, सूबेदार मेजर (आनरेरी)

बनघुसरा, अयोध्या, उत्तर प्रदेश

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