राह कोई कहाँ बताता है,
फर्ज देखों सदा जताता है।
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झेलता आदमी परेशानी,
मतलबी खेल रंग लाता है।
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कौन बोलें कहाँ उबारा है,
बेवजह रात-दिन सताता है।
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लोग बेचैन ढूंढते मंजिल,
देख माहौल दिल जलाता है।
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धूप या छाँव में भटकते सब,
ना कहीं राह नजर आता है।
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कौन सोंचे किसे फिकर इतनी,
सब यहाँ जाल में फँसाता है।
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बेकदर ‘अनि’ भटक रहा यारों,
गजब माहौल जग डराता है।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह
धनबाद, झारखंड