neerajtimes.com – कॉम्पिटिशन हर क्षेत्र में है। मलाईदार पदों के लिए कॉम्पिटिशन के साथ साथ घूसखोर चरित्र का होना भी अनिवार्य योग्यता है। आज के दौर में बिना घूसखोरी के किसी भी पद पर टिके रहना सरल नहीं होता। ईमानदार अधिकारी को उसके सहायक कुर्सी पर अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं करते, इसलिए उसके स्थानांतरण की फेहरिस्त लंबी होती रहती है। वैसे भी जीवन के किसी भी क्षेत्र में ऊंचा मुकाम हासिल करना हंसी खेल का विषय नहीं है। करोड़ों रूपये का माल हजम करने वाले तथा अल्प समय में साईकिल से वायुयान तक, झोपड़ी से ऊंची अट्टालिकाओं तक का सफर तय करने वाले घूसखोर की श्रेणी में नहीं आते। फिर भी घूसखोरी ऐसा रोग है, जो सरकारी क्षेत्र में ही फलता फूलता है। निजी क्षेत्रों में घूसखोरी को कमीशनखोरी की संज्ञा दी जाती है। बहरहाल घूसखोरी में भी घूसखोर शिरोमणि की पहचान जातीय आधार पर कर ली गई है, यह मैं नहीं कहता, किसी फिल्म का शीर्षक कहता है।
लोग उबल रहे हैं, कि उनकी बिरादरी को घूसखोरी का शिरोमणि क्यों बताया जा रहा है। असली घूसखोर इसलिए परेशान हैं, कि उनकी घूसखोरी को घूसखोर शिरोमणि क्यों नहीं चुना गया। मैंने जब से होश संभाला है, घूसखोरी को भारतीय चरित्र में शामिल पाया है। सरकारी अस्पताल हो या बिजली दफ्तर, यातायात विभाग हो या अन्य कोई भी सामान्य विभाग, जिसके पास किसी के बिल पास करने, सरकारी धन की बंदर बाँट करने का अधिकार हो, हर जगह कार्यप्रणाली लगभग समान है, फाइलें तब तक आगे नही सकती, जब तक कि सुविधा शुल्क के नाम पर उसमें घूस के पहिए न लग जाएँ। यूँ तो भ्रष्टाचार मुक्त शासन के विज्ञापन पट कार्यालयों में चमक रहे होते हैं, लेकिन कार्यालयों में बैठे सरकारी उनकी परवाह नहीं करते। कुर्सी पर बैठते ही उनकी हथेली खुजलाने लगती है। जो फरियादी उनके पास अपनी फरियाद लेकर आता है, वह उसकी फरियाद सुने बिना ही अपनी हथेली की खुजलाहट से उसे अवगत करा देते हैं, साथ ही यह इशारा भी देते हैं, कि बिना बोहनी के वे अपने कार्यालय में दिन की शुरुआत नहीं करते। परेशान हाल फरियादी बोहनी कराता है, तब कहीं जाकर अपनी फरियाद सुनाने लायक बन पाता है।
समस्या एक हो तो बताई जाए, घूसखोरी का चलन इतना बढ़ गया है, कि यदि कोई बिना घूस लिए समस्या समाधान का आश्वासन दे, तो फरियादी उस पर यकीन नहीं करता। बहरहाल घूसखोरी के युग में ईमानदार वही कहलाता है, जिसे घूस लेने का अवसर न मिला हो। तिस पर भी घूसखोरों में आपस में कोई कॉम्पिटिशन नहीं होता। जो काम जिसकी सीट का होता है, घूस पर उसका ही अधिकार होता है। फिर भी बदनाम केवल खास जाति का कर्मचारी ही होता है। उसे सरकारी कार्यालय में कार्य करने वाले सभी अधिकारी और कर्मचारी घूसख़ोर में लिप्त तो प्रतीत होते हैं, किन्तु शिरोमणि नहीं। घूस शिरोमणि के विशेषण से वंचित रहने वालों के लिए यह दुःख का कारण है, वे इसे अपनी कमी मानते हैं।
आजकल घूसखोरी अधिकार का स्वरूप लेती जा रही है। सरकारी कार्यालयों में पर्याप्त घूस न मिलने पर फाइलें गायब होने के किस्से भी सुर्ख़ियों में रहते हैं। कुछ घूसख़ोर तो घूस लेकर गर्व से स्वयं को घूस शिरोमणि घोषित करते हैं। उनका स्पष्ट मत होता है, यदि घूसखोरी के आरोप में पकड़े भी गए, तो घूस देकर छूट जाएंगे। ऐसे में जहां घूसखोरी अखिल भारतीय स्तर पर नाम कमा रही है, वहां केवल किसी खास व्यक्ति या जाति को घूसखोर कहना देश में अन्य जातियों के घूसखोरों की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह खड़े करता है। कॉम्पिटिशन का परिणाम गहन सर्वेक्षण और प्रतियोगिता को पारदर्शिता से संपन्न कराने के बाद ही होना चाहिए। (विनायक फीचर्स)
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