मन में बस इक आस लिए,
चल पड़ी अंतिम यात्रा पर।
क्या जलेंगे तुम्हारे दिल में,
अनकही चाहतों के दीये?
जब सज रही होगी चिता,
देखना चाहती हूँ तेरे नम नैन ।
क्या कह पाओगे उस पल कुछ,
पा सके देह मोक्ष और मिले चैन।
मेरे खाक होने पर सुनो न,
मेरी राख होने तक रुको न।
तुम मन ही मन चाहते रहे सदा,
जानती हूँ — यही सच है, कहो न।
तुम किसी और के न हो पाए,
मैं अंत तक तेरी ही रह गई।
बाट जोहती रही कि वह पल आए,
देहरी पर अपलक खड़ी रही मुई।
गंगा में बस तुम राख बहा देना,
कि खुल जाए स्वर्ग का रास्ता।
जो कह न पाए कभी शब्दों में,
तुम्हें कसम है उस प्यार का वास्ता।
हाँ, देखा चुपके से मैंने तुमको,
मुट्ठी भर राख उठा ले गए।
अब तसल्ली है मुझे इतनी
सारी रस्म निभा के तुम गए!.