टूट कर सौ खण्ड तेरे ,
देहरी पर आ पड़ी हूँ।
किन्तु जग कहता न थकता,
आज तक पाषाण हूँ मैं।
चेतना भी मैं मिटाती ,
काश ! यदि होती अकेली ।
किन्तु पथ में प्रीत तेरी ,
बन गई मेरी सहेली ।
है न अब अधिकार जिसपर…
सद्य तेरा प्राण हूँ मैं।
किन्तु जग कहता न थकता,
आज तक पाषाण हूँ मैं।
है यहाँ तू भी मुझे जो
मानता आराध्य अपना ।
साधना रत नित्य मुझमें,
हेरता तू साध्य अपना ।
हो गई तेरे निमित प्रिय !
वंद्य नित भगवान हूँ मैं।
किन्तु जग कहते न थकता,
आज तक पाषाण हूँ मैं।
भाव की यह बात प्रियवर !
कौन मुझको क्या पुकारे ।
नैन तेरे देखते हैं,
भव्य मुझमें चाँद तारे ।
है बहुत मेरे लिए तू…
कह रहा द्युतिमान हूँ मैं।
किन्तु जग कहते न थकता,
आज तक पाषाण हूँ मैं।
– अनुराधा पांडेय, द्वारिका, दिल्ली