मनोरंजन

मकरसंक्रांति – रुचि मित्तल

आज सूरज

थोड़ा सा उत्तर की ओर झुका है

जैसे थक कर

किसी किसान के कंधे पर

हाथ रख दिया हो।

खेतों में

नई फसल की ख़ामोश मुस्कान है

मिट्टी के हाथों में

मेहनत की गर्माहट है।

आसमान में उड़ती पतंगें

सिर्फ़ धागों से नहीं बंधी

वे उम्मीदों की गांठों से जुड़ी हैं

हर ऊँचाई पर

एक अधूरी प्रार्थना।

घर के आँगन में

तिल और गुड़ की खुशबू

बीते हुए मौसमों को

मीठे शब्दों में समझाती है

कि ठंड के बाद

धूप ज़रूर आती है।

#मकरसंक्रांति

कोई त्योहार नहीं

यह भरोसा है

कि अंधेरे की चाल

अब पीछे की ओर मुड़ चुकी है।

©रुचि मित्तल, झज्जर , हरियाणा

 

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