Neerajtimes.com – पूस की रात वर्ष की सबसे ठंडी रातों में गिनी जाती है। इस रात की ठिठुरन मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षियों और समस्त जीव-जगत को अपनी चपेट में ले लेती है। ठंड से बचने की जद्दोजहद हर प्राणी करता है, पर यह रात केवल ठंड की नहीं, समय के बदलते स्वरूप की भी कहानी कहती है।
कल की पूस की रात कुछ और ही थी। गाँव की गलियों में जलते अलाव, उनके चारों ओर बैठे लोग, हाथ सेंकते हुए जीवन के सुख-दुख बाँटते थे। बुज़ुर्ग अपने अनुभव सुनाते, युवा भविष्य के सपने बुनते और बच्चे अलाव की लपटों से खेलते। ठंड के बीच रिश्तों की गर्माहट थी। संवाद था, अपनापन था। सामूहिकता के उस एहसास में समय कब बीत जाता, पता ही नहीं चलता था। ठंड शरीर को छूती थी, पर मन तक नहीं पहुँच पाती थी।
आज की पूस की रात आधुनिक सुविधाओं से घिरी हुई है। घर-घर हीटर हैं, ब्लोअर हैं, मुलायम गद्दे और रजाइयाँ हैं। कमरे इतने बंद कि हवा भी प्रवेश की अनुमति माँगती है। सुविधा ने ठंड से तो बचा लिया है, पर साथ बैठने, बतियाने और एक-दूसरे की उपस्थिति महसूस करने का अवसर कहीं पीछे छूट गया है। हर व्यक्ति अपने-अपने कमरे में सिमट गया है, तकनीक के साथ, पर इंसानी संवाद से दूर।
लेकिन इस बदलते समय की सबसे कड़वी सच्चाई गरीबों की पूस की रात है। झोपड़ियों में रहने वाले लोग आज भी उसी ठंड से जूझ रहे हैं, बिना पर्याप्त कपड़ों और साधनों के। उनके लिए पूस की रात अब भी उतनी ही पीड़ादायक है, जितनी पहले थी—शायद उससे भी अधिक। जहाँ एक ओर सुविधा सम्पन्न लोग बंद कमरों में आराम फरमाते हैं, वहीं दूसरी ओर खुले आसमान तले ठिठुरती ज़िंदगियाँ इस रात की कठोरता को झेलती हैं।
इस तरह पूस की रात केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि समाज के बदलते चेहरे का आईना है। कल की पूस की रात में सामूहिकता की ऊष्मा थी, आज की पूस की रात में सुविधा की गर्मी है। पर सच यह है कि जब तक हर व्यक्ति को ठंड से बचने का समान अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक पूस की रात की ठंड केवल मौसम की नहीं, संवेदनाओं की भी बनी रहेगी। -रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़