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मेरी कलम से  – रुचि मित्तल

कैसे  कहूँ  मैं  आपसे  बातें  वो अन  कही

कुछ आप भी तो अनकहा समझो मेरे हुज़ूर।

 

कहने से आप कब भला सुधरे हैं आज तक,

बस इसलिए ही मौन की आदत सी हो गयी।

 

खुद को दरिया में जो उतारेगा,

अपना जीवन वो ही सवारेगा,

सुन ले दुनिया को जीतने वाले,

अपने  ही  आप  से  तू  हारेगा।

 

कभी  सोचा  तुझे  मैंने  तो  ये दिल मुस्कुराया भी,

कभी खामोश बैठे और कभी कुछ गुनगुनाया भी,

किये  जितने  जतन  मैंने  फ़क़त  बेकार  थे  सारे ,

बहुत  चाहा  न  आये  याद  पर तू याद आया भी।

– रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

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