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वर्ष अभिनव क्या करेगा नया? – अनुराधा पांडेय

वर्ष अभिनव भला क्या करेगा नया ?

चित्त अब तक उभय के पुरातन वही।

मैं सुबकती बसूंगी उसी गांव में ‌,

तुम‌ करोगे विजन‌ में त्रिधे! फिर निलय।

फिर रहेगी मिलन की अधूरी ‌कथा ,

दूर रोते रहेंगे पुनः दो हृदय।

द्वय रहेंगे विरह सिक्त फिर पूर्व-से –

है कहानी प्रणय की सनातन वही ।

वर्ष अभिनव भला क्या करेगा नया ,

चित्त अब तक उभय के पुरातन वही।

वर्ष- ऐसे मिले पूर्व में भी कई,

थे विरल ही दिवे ! किन्तु क्षण तृप्ति मय।

यामिनी तो तृषाधृत अमा की रही ,

पर निशा थी विरल जो करे दीप्तिमय।

राग की बदलियां भर घुमड़ती रही,

और रोते रहे नैन खंजन वही..….

वर्ष अभिनव भला क्या करेगा नया,

चित्त अब तक उभय के पुरातन वही।

गीत कोई नया बन सका क्या कहो ,

एक ही धुन रची छंद अनुप्रास- से ?

नित्य अभिनव उठी कब हृदय काकली,

नव पुहुप कब मिला नव्य मधुमास से?

मात्र अनुक्रम वही एक चलता रहा।

स्वर पुरातन वही और व्यंजन वही।

वर्ष अभिनव भला क्या करेगा नया,

चित्त अब तक उभय के पुरातन वही.

– अनुराधा पांडेय, द्वारिका दिल्ली

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