मनोरंजन

ओर-छोर – सविता सिंह

शांत हो गए सब शोर

पर आई कहाँ वह भोर,

अब बता ए दिल जरा

जाएगा कित ओर।

अस्त होता सूरज मद्धम

पटरी पर चलती रेल,

गिरना उठना संभालना

बस ये जीवन का खेल।

कोई हो छोर हिस्से में

जो थामें रखती डोर,

मन मेरा तो वृन्दावन

कहाँ हो माखन चोर।

-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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