ऊंची ऊंची बात बनाना , सीख न पाया मैं तो यारो ।
सत्ता का चारण हो जाना ,सीख न पाया मैं तो यारो ।।
जाति धर्म की घास उगी है, भूधर, घाटी, मैदानों में ।
सत्ता खोज रहे हैं नेता,गांव शहर के शमशानों में ।
पशुता नांचे दरबारों में ,निर्वाचन के गलियारों में ,
भड़काऊ नारे लगवाना ,सीख न पाया मैं तो यारो ।।1
अधिकारों की फ़सल उगी है ,लोकतंत्र के इस आंगन में ।
कर्तव्यों की मौत हो रही ,दाग खून के हर दामन में ।
पूजा होती अय्यारों की , जाति धर्म के मक्कारों की ,
इनके जैसा लाभ उठाना ,सीख न पाया मैं तो यारो ।।2
बाजारू आपाधापी में ,आदर्शों को बिकते देखा ।
छंद ज्ञान भी काम न आया ,खुला नहीं मंचों पर लेखा ।
बड़े बड़े कवियों के फंडे, सीख न पाया मैं हथकंडे ,
संबंधों का चैक भुनाना ,सीख न पाया मैं तो यारो ।।3
सिंडिकेट बने मंचों के ,गुटबाजों की गहमागहमी ।
छंद उपासक बेबस फिरते ,झेल रहे इनकी बेरहमी ।
काम न आती है कविताई, ‘ ‘हलधर’ जान गया सच्चाई ,
रोज पुराने गीत सुनाना ,सीख न पाया मैं तो यारो ।।4
ऊंची ऊंची बात बनाना ,सीख न पाया मैं तो यारो ।।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून