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मेरी कलम से – नीलांजना गुप्ता

पंकज रह ज्यों पंक में रहता है निर्लेप,

त्यों प्राकृत व्यवहार में मत करिये आक्षेप।

 

गुरु तू मेरा कमल दल मुझे दिया है ज्ञान,

अन्तस् में मकरन्द है नहीं कीच का भान।

 

ऐसे ही जग में रहे जीव सुगन्ध समान,

माया रूपी कीच में मत फसना नादान।

 

दलदल में रहकर भी तूने दिनकर को प्रीत में बाँधा है।

मण्डल सूर्य कृष्ण तेरा और तू उसकी प्रिय राधा है।

-नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

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