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घुमंतु समुदायों और जनजातियों तक पहुँची डॉ. अलका यादव – अशोक यादव

neerajtimes.com – “घुमंतु समुदाय, जनजातियाँ और लोक संस्कृति की वाचिक परंपरा केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति की आत्मा और हमारी पहचान है। इन्हें सहेजना और संरक्षित करना मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा है।” — डॉ. अलका यादव, शोधव्यता एवं साहित्यकार

वीरांगना बिलासा देवी : लोकगाथाओं से उभरती असली नायिका

जनश्रुतियों से लेकर पांडुलिपियों तक दर्ज है शौर्य की अमर कहानी

बिलासा की गाथा कोई कल्पना नहीं –

बिलासा देवी की कहानी जनश्रुतियों, लोकगाथाओं, लोक कहावतों, कत्थ्यों और अनेक पांडुलिपियों में दर्ज है। ‘बिलासा केंवटिन’ काव्य संदिग्ध इतिहास नहीं, बल्कि जनकवि-गायक देवारों की असंदिग्ध मौखिक परंपरा है।

लोक परंपरा में जीवित वीरता –

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर में वीरांगना बिलासा देवी की वीरुदावली का विशेष महत्व है। देवार जाति द्वारा प्रस्तुत यह मौखिक परंपरा उनकी वीरता और कार्यों का विस्तार से वर्णन करती है। गाथाएँ उन्हें केवल एक केवटी नहीं, बल्कि लोकनायिका के रूप में स्थापित करती हैं।

शोध और खोज की यात्रा –

बिलासपुर की प्रख्यात शोधव्यता और साहित्यकार डॉ. अलका यादव ने इस विषय पर गहन अध्ययन किया। वे उन घुमंतु समुदायों और जनजातियों तक पहुँची, जिनकी स्मृतियों और गीतों में आज भी वीरांगना बिलासा देवी की गाथाएँ जीवित हैं।

इतिहासकारों की राय –

इतिहासकारों का मानना है कि बिलासा देवी की गाथाओं को केवल लोकगीतों तक सीमित न रखकर अकादमिक और लिखित रूप में सुरक्षित करना ज़रूरी है। इससे आने वाली पीढ़ियाँ समझ पाएँगी कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति में महिला शौर्य और पराक्रम का कितना गहरा स्थान है।

बिलासा देवी की गाथा केवल लोक परंपरा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है और सांस्कृतिक अस्मिता को जीवित रखती है।

 

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