मनोरंजन

आज की रात दीये – रूचि मित्तल

कुछ जल्दी जल गए हैं
जैसे उन्हें भी इंतज़ार हो
कल की रौशनी का।
आँगन में हल्की सी खुशबू है
मिट्टी और तेल की
जिसमें बचपन की यादें
अब भी झिलमिलाती हैं।
दीवारों पर पड़ती रोशनी
कोई नक़्श नहीं बनाती,
बस ये एहसास दिलाती है
कि अँधेरे से लड़ना
हमेशा मुमकिन है।
किसी कोने में कोई माँ
अब भी तुलसी पर दीया रखती है
कहती है रौशनी रहे,
चाहे कम ही सही।
बच्चों की हँसी,
पटाखों की आवाज़,
और मन की आशाएँ
तीनों मिलकर
एक सम्पूर्ण खुशी रचते हैं।
#छोटी_दिवाली,
जैसे बड़ी उम्मीद से पहले की
एक कोमल मुस्कान हो।
#शुभ_दीपावली।
– रूचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा ,

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