मनोरंजन

मन घूमता वीरान में – जसवीर सिंह हलधर

तन राह भूला भीड़ में मन घूमता वीरान में ।
क्यों कैद इसमें हो गया इस बात से हैरान मैं ।।

वैभव सभी करते नमन क्या याचना देती शरण ।
आंसू सियाही हो गए है गीत का ऐसा चरण ।।
सब मछलियां घायल मिलीं सागर उठे तूफान में ।
सबका वरण करता मरण इस बात से अनजान मैं ।।1

क्यों अश्क से लिखता कता आंसू अगर बिकते यहां ।
अपने पराये हमसफर सब एक से दिखते यहां ।।
इन पत्थरों के शहर में होता बहुत धनवान मैं ।
क्या खोजती है जिंदगी इस अधमरे इंसान में ।।2

हर भूख से वाक़िफ हुआ ,हर प्यास से परिचय हुआ ।
इन गीत,गज़लों के लिए उद्देश्य तब निश्चय हुआ ।।
कुछ पुस्तकों में पा लिया, कुछ पा लिया दीवान में ।
ये शारदा का दान है क्यों कर रहा अभिमान मैं ।।3

ये व्योम की औलाद हैं सीमा नहीं कुछ शब्द की ।
क्या जान पाया है कोई ऊंचाइयां इस अब्द की ।।
क्यों प्राण क्रीड़ा कर रहे इस मौत के मैदान में ।
आशीष “हलधर” को मिला ,कविता मिली वरदान में ।।4
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

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