राष्ट्रीय

मनुवादी व्यवस्था – प्रदीप सहारे

neerajtimes.com – विदर्भवासी सर न्यायमूर्ति भूषण गवई के ऊपर भरे न्यायालय में जूता फेंकने की घटना, और उस पर आए मिश्रित प्रतिक्रियाएँ — कुछ विरोध, कुछ बचाव, और कुछ “कुछ हुआ ही नहीं” वाला दृष्टिकोण — यह सब एक समानांतर व्यवस्था का प्रदर्शन करती हैं।
यह व्यवस्था भले अदृश्य हो, परंतु जब मन और मस्तिष्क से बाहर आती है, तो दृश्य बन जाती है, और फिर चर्चा का दौर चल पड़ता है। यह घटना सिद्ध करती है कि ऐसी व्यवस्थाएँ आज भी हमारे समाज में सक्रिय हैं।
यह दूसरी घटना है। पहली घटना तब हुई थी जब सर न्यायमूर्ति भूषण गवई के न्यायाधीश बनने के बाद, पहली बार महाराष्ट्र आगमन पर — प्रोटोकॉल के अनुसार — कोई भी मंत्री या उच्च अधिकारी एयरपोर्ट पर स्वागत के लिए नहीं पहुँचा था।
तब भी सवाल और बवाल उठे थे, पर बाद में मामला शांत हुआ, और मुख्यमंत्री ने स्वयं उनके घर जाकर सत्कार किया, जिसे उन्होंने स्वीकार भी किया।
यहाँ यह सिद्ध होता है कि व्यवस्थाएँ प्रायः दबंग होती हैं, और उनके सामने व्यक्ति बेचारेपन की स्थिति में आ जाता है।
फिर चाहे वह सर न्यायमूर्ति जैसे उच्च पद पर क्यों न हो, वह भी घर जाकर हुए सत्कार को अस्वीकार नहीं कर पाया — मन की बातें मन में ही रह गईं, और मनुवादी व्यवस्था की फिर से जीत हुई।
ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ मनुवादियों ने संविधानवादियों को स्वीकार नहीं किया, बल्कि उनका विरोध ही किया। यह संघर्ष सदियों से चला आ रहा है — इतिहास में पढ़ा भी, और आज प्रत्यक्ष देख भी रहे हैं। नौकरी में भी यह संघर्ष आज तक जारी है। एक मनुवादी कभी नहीं चाहता कि वह संविधानवादी के अधीन काम करे — भले ही उसे नौकरी छोड़नी पड़े।
ऐसा ही एक वाकया याद आता है — नागपुर की एक शैक्षणिक संस्था का। उस संस्था में, विश्वविद्यालय नियमावली के अनुसार, प्राचार्य (Principal) का पद संविधानवादी वर्ग के लिए आरक्षित था। पर मनुवादी प्रबंधन ने ठान लिया कि “हमारे कॉलेज में संविधानवादी प्राचार्य नहीं होगा।”
फिर क्या हुआ — विज्ञापन निकलते रहे, पर सही उम्मीदवार नहीं मिला कहकर, कॉलेज के वरिष्ठ मनुवादी विचारधारा के प्राध्यापकों को ही बार-बार प्राचार्य बनाया जाता रहा।यह प्रथा आज भी निरंतर चल रही है।
प्रगतिशील युग और विज्ञान के दौर में भी ऐसी घटनाएँ घट रही हैं — तो सोचिए, इतिहास में यह संघर्ष कितना पीड़ादायक रहा होगा! और विडंबना यह है कि ऐसे ही लोग आज आरक्षण हटाने की माँग करते हैं — जबकि हकीकत में आरक्षण होते हुए भी हालात ऐसे हैं!
मनुवाद और संविधानवाद — यह विचारों का एक सदियों पुराना संघर्ष है, जो कभी अदृश्य रूप में मस्तिष्क के कोने में छिपा रहता है, तो कभी दृश्य रूप में प्रकट होकर समाज के सामने आ जाता है। और शायद तब तक आता रहेगा —जब तक विचारों का शुद्धिकरण नहीं होता।
– प्रदीप सहारे , नागपुर , महारष्ट्र

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