मनोरंजन

गीत- जसवीर सिंह हलधर

 

मूरत को छप्पन भोग लगें, दिखता  भूखा इंसान नहीं ।

पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।

 

नहलाते दिन में चार बार, पाहन को भोग लगाते हैं ।

सोने चांदी के अलंकार, आभूषण उसे पिनाते हैं ।

नारायण असली सूख रहा, भूखा रोटी को ढूक रहा,

रेशम पाषाण पहनते है, मानव तन पर परिधान नहीं ।

पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।1

 

एकड़ में मंदिर मस्जिद हैं, चालों में बचपन घुटता है ।

शम्भू की बीबी दुर्गा का, गुरबत में यौवन लुटता है ।

अपनी अस्मत को लुटा लुटा, बच्चों को खाना रही जुटा,

लो आज सत्य बतलाता हूँ, जिसका जग को संज्ञान नहीं ।

पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान  नहीं ।।2

 

दो दो दाने को आज जहां, भूखे बच्चे छटपटा रहे ।

मंदिर मस्जिद के मुस्टंडे, अय्यासी में धन लुटा रहे ।

पकवानों के हैं ढेर वहां, अंतड़ियां सूखी पड़ी यहां,

होटल में मांस चरें पांडे, बेबस को रोटी दान नहीं ।

पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।3

 

भगववान आज भूखा बैठा, खो जली झोपड़ी में ।

कंकाल लिए सूखा बैठा, कर संताप खोपड़ी में ।

सांसों की गिनती खिसक रही, पैदल चल बेटी सिसक रही,

नेता जी मस्ती छान रहे, भूखे कृन्दन पर ध्यान नहीं ।

पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।4

 

पतली सी चादर में लिपटा, अपने दुखड़ों को बांट रहा ।

नंगे पांवों पैदल चलकर, पत्थर को पग से  काट रहा ।

जब गरम हवाएं चलती है, बच्चों की त्वचा झुलसती है,

निर्माण किया जिसने मंदिर, अंदर उसको ही मान नहीं ।

पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।5

 

मजदूरों की सुन लो पुकार, कहता हूँ सबसे बार बार ।

जगती के निर्माता से ही, क्यों होता है यह अनाचार ।

होवें सरकारी प्रावधान, हो भूख गरीबी का निदान,

हलधर” कविता चिंगारी है, ये कोरा कल्प बखान नहीं ।

पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।6

-जसवीर सिंह हलधर, देहरादून

Related posts

मनहरण घनाक्षरी – मधु शुक्ला

newsadmin

गीत – मधु शुक्ला

newsadmin

केहू ना केहू के भाई – अनिरुद्ध कुमार

newsadmin

Leave a Comment