मूरत को छप्पन भोग लगें, दिखता भूखा इंसान नहीं ।
पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।
नहलाते दिन में चार बार, पाहन को भोग लगाते हैं ।
सोने चांदी के अलंकार, आभूषण उसे पिनाते हैं ।
नारायण असली सूख रहा, भूखा रोटी को ढूक रहा,
रेशम पाषाण पहनते है, मानव तन पर परिधान नहीं ।
पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।1
एकड़ में मंदिर मस्जिद हैं, चालों में बचपन घुटता है ।
शम्भू की बीबी दुर्गा का, गुरबत में यौवन लुटता है ।
अपनी अस्मत को लुटा लुटा, बच्चों को खाना रही जुटा,
लो आज सत्य बतलाता हूँ, जिसका जग को संज्ञान नहीं ।
पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।2
दो दो दाने को आज जहां, भूखे बच्चे छटपटा रहे ।
मंदिर मस्जिद के मुस्टंडे, अय्यासी में धन लुटा रहे ।
पकवानों के हैं ढेर वहां, अंतड़ियां सूखी पड़ी यहां,
होटल में मांस चरें पांडे, बेबस को रोटी दान नहीं ।
पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।3
भगववान आज भूखा बैठा, खो जली झोपड़ी में ।
कंकाल लिए सूखा बैठा, कर संताप खोपड़ी में ।
सांसों की गिनती खिसक रही, पैदल चल बेटी सिसक रही,
नेता जी मस्ती छान रहे, भूखे कृन्दन पर ध्यान नहीं ।
पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।4
पतली सी चादर में लिपटा, अपने दुखड़ों को बांट रहा ।
नंगे पांवों पैदल चलकर, पत्थर को पग से काट रहा ।
जब गरम हवाएं चलती है, बच्चों की त्वचा झुलसती है,
निर्माण किया जिसने मंदिर, अंदर उसको ही मान नहीं ।
पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।5
मजदूरों की सुन लो पुकार, कहता हूँ सबसे बार बार ।
जगती के निर्माता से ही, क्यों होता है यह अनाचार ।
होवें सरकारी प्रावधान, हो भूख गरीबी का निदान,
हलधर” कविता चिंगारी है, ये कोरा कल्प बखान नहीं ।
पत्थर को माखन खिला रहे, मजदूरों का सम्मान नहीं ।।6
-जसवीर सिंह हलधर, देहरादून