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ग़ज़ल – विनोद निराश

 

ख्वाब तेरे ही आँखों में जारी है,

आँख की दिल से वफादारी है।

 

रोज़ तोड़ता हूँ ताल्लुक मगर,

दिलो-दिमाग में खूब यारी है।

 

आँख से ख्वाब न हुए अलैहदा,

बस दोनों में जद्दो-जेहद जारी है।

 

किसी बेवफा पे ऐतबार करना,

ये भी तो बहुत बड़ी वफादारी है।

 

तुम तो भूल ही गए हो मुझको,

मगर याद रख अब मेरी बारी।

 

छुपाके दर्दे-दिल बेदर्द जमाने में,

हँस के जीना इक अदाकारी है।

 

वो क्या चले छोड़ के साथ मेरा,

अपनी भी रुखसती की तैयारी है।

 

कल तो निराश आँखों में कटी

आज की रात कल से भारी है।

– विनोद निराश, देहरादून

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