गैरत भरी थी उनमें वो बाज़ार हो गये।
छोड़े श़ज़र अकेले,वो बेज़ार हो गये।
लब खूबसूरत उनके नशा मुझको अब हुआ
ऐसा चढ़ा खुमार मैं निस्तार हो गया।।
नीची किये ऩज़र वो शर्मो-हया से अब।
मयखाने शहर भर के गुलजार हो गये।
जब तक रही ग़रज थी वो बातें बड़ी करे।
निकला है आज मतलब वो बेकार हो गये।
मौसम मिजाज बदला,तबाही *ऋतु कर गया।
ऐसे मे मुआवजे के वो हकदार हो गये।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़