neerajtimes.com – हिंदी दिवस पर समूचा भाषाई परिदृश्य बड़ा ही रंगीला होता है। हर साल 14 सितंबर बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है । इसका ही अंतर्राष्ट्रीय वर्जन 10 जनवरी को मनाया जाता है। हिंदी दिवस पर सरकारी कार्यालयों में बड़े-बड़े बैनर टंगे होते हैं “हिंदी हमारी शान, हिंदी हमारी आन।” लेकिन जैसे ही यह दिन बीतता है, हिंदी फिर वहीं की वहीं रह जाती है । हां हिंदी दिवस समारोह में भाषण, निबंध
और वाद विवाद प्रतियोगिता की फोटो संस्थान की वेबसाईट पर अपलोड हो जाते हैं। ये और बात है कि वेबसाइट के हिन्दी वर्शन की तलाश करने के लिए क्लिक करें तो पेज पर मैसेज आता है कमिंग सून। पोर्टल डेवलपर बेपरवाह कहता है “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना ” ।
हिंदी दिवस पर स्कूल में कार्यक्रम होते हैं। बच्चे “मेरी हिंदी, मेरी शान” गाने गाते हैं। किसी नन्हे बच्चे की मासूम आवाज में “वंदे मातरम्” गूंजता है। शिक्षकगण गर्व से कहते हैं “हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है। इसे हर दिल में बसाना चाहिए।” पर जैसे ही स्कूल की छुट्टी की घंटी बजती, बच्चों के पेरेंट्स गेट पर अपने बच्चों को गोद में उठाकर पूछते हाऊ वाज फंक्शन ??
डिजिटल इंडिया के नवयुग में हिंदी को सम्मान देने के सर्कुलर के परिपालन में बैंक के फॉर्म्स हो या स्वास्थ्य सेवा से जुड़े एप्लिकेशन, हिंदी में भरने की प्रक्रिया सुलभ कर दी गई है। भले ही वह इतनी उलझी-सी है कि इसे समझने के लिए हाऊ टू फिल हिंदी फार्म नामक गाइड्स बनानी पड़ती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी अंडर कंस्ट्रक्शन ।
स्वास्थ्य सेवा में तो हिंदी की कहानी बड़ी मजेदार है। मरीज अस्पताल में अपनी समस्या हिंदी में बताने की कोशिश करता है, जबकि डॉक्टर अंग्रेजी में प्रिस्क्रिप्शन लिखते हैं। एक पल के लिए ऐसा लगता है कि डॉक्टर और मरीज के बीच भाषा का पुल दवा दुकानदार के माध्यम से ही बना है। दवा के लिफाफों पर दुकानदार दिन में तीन बार लिख देता है तब मरीज को समझ आता है कि यह थ्राईस डेली क्या होता है। मेडिकल रिपोर्ट समझने के लिए लाल अक्षरों वाले पैरामीटर भर देखने लायक अंग्रेजी शिक्षा हर हिंदी भाषी को आ ही जाती है।
सरकारी कार्यालयों में हिंदी के फार्म भरना भी मजेदार अनुभव होता है। फार्म के नियम, दिशा-निर्देश, नोटिस सब अंग्रेजी में ही लिखे रहते हैं। हिंदी में विकल्प होते हैं पर अंग्रेजी कैपिटल लेटर्स में बॉक्स में फॉर्म भरना होता है।
हिंदी में काम करना किसी पर्वतीय अभियान से कम नहीं होता। चाहे तो क्या नहीं हो सकता,” ऐसा कहने वाले तो बहुत हैं, पर हिंदी को ‘कमिंग सून’ से बाहर निकालने का साहस शायद अब तक किसी के पास नहीं! और जब तक यह साहस नहीं होता तब तक
हिंदी दिवस का महत्व और हिंदी अधिकारी की नौकरी बरकरार रहेगी । नेताजी हिंदी को बढ़ावा देने के लिए ट्वीट करते रहेंगे । “हिंदी हमारी पहचान है, इसका विकास राष्ट्र का विकास है।” ऐसे संदेश की हेड लाइंस पर टीवी चैनल्स और अखबार के रिपोर्टर ब्रेकिंग न्यूज बनाते रहेंगे। (विभूति फीचर्स)
previous post