राष्ट्रीय

मात्र भाषा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता का सार है हिन्दी – डॉ. सुधाकर आशावादी

 

neerajtimes.com – किसी भी समाज में अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भाषा ही है। बहुसंस्कृति वाले भारत में जहां आंचलिक भाषाओं का बोलबाला है तथा कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी जैसी कहावत चरितार्थ होती है। जहां क्षेत्रीय आधार पर अनेक भाषाएँ प्रचलित हैं। वहाँ एक ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाना अपेक्षित रहा, जो पूरब से लेकर पश्चिम तक तथा उत्तर से लेकर दक्षिण तक समाज को एक सूत्र में पिरो सके, जिसमें भाषाई समन्वय की सामर्थ्य हो। इसीलिए यहां समूचे राष्ट्र में हिंदी भाषा को मान्यता मिली, जिसकी लिपि देवनागरी है।
निस्संदेह किसी भी राष्ट्र की एकता एवं अखंडता को बनाए रखने के लिए भाषा ही सभ्यता एवं संस्कृति के उत्थान में सेतु का कार्य करती है। अनेक बोलियों की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा ही होती है। भाषा को मातृभाषा, राजभाषा एवं राष्ट्र भाषा के रूप में वर्गीकृत करके भले ही विशिष्ट दृष्टिकोण से कार्यपालिका में व्यावहारिक प्रयोग के लिए उपयुक्त या अनुपयुक्त समझा जाए, किंतु इतना अवश्य है कि किसी भी राष्ट्र में विशिष्ट भाषा को जीवन व कार्यशैली में अपनाया जाना अपेक्षित होता है। भारतीय संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 को हिंदी भाषा को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। तदुपरांत 26 जनवरी 1950 को देश भर में हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्य किया गया। सामान्य तौर पर विचार किया जाए तो स्पष्ट होगा कि हिंदी देश में प्रभावी ढंग से विचारों के आदान प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रही है। वर्तमान में सोशल मीडिया के बढ़ते वैश्विक प्रभाव में हिंदी भाषा देश विदेश में लोकप्रिय है। हिंदी सिनेमा ने ग़ैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी अपनी पैठ बनाई है। अंतर्राष्ट्रीय जगत में हिंदी का महत्व इतना बढ़ा है कि समृद्ध एवं शक्ति सम्पन्न देशों में भी हिंदी का प्रयोग किया जा रहा है तथा अनेक राष्ट्रों में विश्व विद्यालय स्तर पर हिंदी भाषा का पठन पाठन किया जा रहा है। यही नहीं वैश्विक व्यापार में भी हिंदी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।कहने का आशय यही है कि क्षेत्रीय भाषाई संकीर्णता के आधार पर कतिपय राजनीतिक दल मराठी, तमिल, तेलगू असमिया, बंगाली, बोडो, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, उर्दू आदि भाषाओं के समर्थन में हिंदी भाषा का विरोध करें तथा भाषायी आधार पर हिंदी को कमतर दर्शाने का प्रयास करें, किंतु व्यावहारिक स्तर पर व्याकरण की दृष्टि से समृद्ध हिंदी की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
सो हिंदी को हेय दृष्टि से देखने वाले तत्वों को समझ जाना चाहिए कि हिंदी को किसी भी प्रकार की बैसाखियों की आवश्यकता नही है। यह स्वयं में ही समृद्ध है तथा अपनी विशिष्टता से इसका मार्ग कोई अन्य भाषा अवरुद्ध नहीं कर सकती। (विनायक फीचर्स)

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