ये मत समझना कि मैंने हार मान ली
कभी-कभी पीछे हटना
आगे कूदने की तैयारी होती है।
मैं चुप हूँ, क्योंकि शोर थक गया है।
मैं अकेली हूँ
क्योंकि भीड़ में पहचान खो गई थी।
मैं थकी नहीं हूँ
मैं सिर्फ खुद को फिर से तराश रही हूँ।
जिस दिन लौटूँगी
मेरे भीतर सिर्फ लहू नहीं होगा
आग होगी..
और वो सब जलाएगी
जो मुझे कमज़ोर समझते हैं।
मैं रोयी भी हूँ
लेकिन हर आँसू ने मुझे मज़बूत किया है।
मैं टूटी भी हूँ
लेकिन हर टुकड़े से
एक नई रोशनी निकली है।
जो मेरी कब्र खोद रहे थे
उन्हें अब बाग़ लगाना पड़ेगा
क्योंकि मैं फिर आऊँगी
और इस बार मेरी जड़ें ज़मीन में नहीं
इरादों में होंगी।
©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा