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यूँ ही – ज्योत्सना जोशी

 

neerajtimes.com – अपने मन की सारी की सारी छटपटाहट तो अपने सबसे प्रिय से भी सांझा नहीं करनी चाहिए मैं ऐसा मानती हूं,

और प्रेम में प्रेम ज़ाहिर करने का उतावलापन भी नहीं,

मुझे स्पेस चाहिए तो सम्भवतः दूसरे को भी स्पेस चाहिए,और उसकी इस आज़ादी को बेपरवाह होकर स्वीकार कीजिए यकीन कीजिए जिस पर दिल हार गये हो ना उसकी गैर-मौजूदगी मौजूदगी से कहीं ज्यादा खूबसूरत और दिलकश होती है।

खैर यह तो अपने आप होता चला जाएगा कि जिस बात को साझा करना तुम ज़रुरी समझोगे वह सबसे पहले उसी से होगी अब यह सामने वाले पर निर्भर करता है कि आपके इस अपनापे के बदले आपको कैसा महसूस करवाया जाता है,

और ज़्यादातर आपको तसल्ली ही मिलती होगी कहीं भीतर का शुष्क कोना गीला ही होता होगा।

किसी के दिल में या कहूं कि उसके जीवन में अपनी वह जगह बनाना जिसे ख़ास कहा जा सकता है उसके लिए वक्त प्रतिक्षा मांगता है,

और एक उम्र खर्च किए जाने के बाद का हासिल भी पाने और खोने से परे हो जाता है ।

अब जब एक दूसरे की अनुपस्थिति में भी स्वयं को न्योछावर कर दिया हो तो यह इस भाव का अटूट हिस्सा है।    ज्योत्सना जोशी, देहरादून, उत्तराखंड

 

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