मनोरंजन

स्वप्न – किरण दास

 

अश्रु सजे नेत्र पर, टूटे गीत अधर पर।

मिट गया नाम वहीं, जो लिखा था नेत्र पर।।

 

और मैं वहीं बैठी रेत समेटती रही ।

हाय नींद खुल गई और स्वप्न देखती रही।।

 

गीत भी लिखी न थी, वे अश्रु मिट गए।

अक्षर-अक्षर जब जुड़े, तो अर्थ ही सिमट गए।।

 

हम गए थे भाग्य द्वार और उसी से पीट गए।

स्वप्न मेरे ओढ़ कफ़न, काल से लिपट गए।।

 

ये दिवा के स्वप्न थे कि थार की मरीचिका।

मोल मेरा था नहीं और स्वप्न मेरा था बिका।।

 

और मैं खड़ी-खड़ी, नीर नयन में भरी।

दूर के मकान से यह नीलामी देख रही।।

 

हाय! नींद खुल गई और स्वप्न देखती रही।।

– किरण दास ‘काव्या’ सरिया, सारंगढ़

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