पड़ गई पीछे मुसीबत क्या करें,
इश्क की छूटे न आदत क्या करें।
पास रहकर भी न हों जो पास में,
हम भला उनसे शिकायत क्या करें।
है जमाना साथ उनके जब सदा ,
दर्दे दिल की हम वकालत क्या करें।
बेरुखी उनकी न देती दर्द अब,
दिल करे उनसे मुहब्बत क्या करें।
ज़ुल्म कर यदि ‘मधु’ उन्हें सुख मिल रहा,
आ रही है रास आफत क्या करें।
— मधु शुक्ला,सतना,मध्यप्रदेश