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मिहनत ना कबूल हुई – अनिरुद्ध कुमार

 

क्यों बिधाता मन अधीर किया?

दिल चीर कलेजा पीर किया।

हाय स्नेहिल स्वप्न बिखर गये,

हाय बज्रपात गंभीर किया।

लहलह फसलें क्यों लोट रहीं,

धरती आँसू क्यों घोंट रहीं।

व्याकुल मनवा ना धीर धरें,

इस चाहत में क्या खोट रहीं?

वो बैठ किनारे सोच रहा,

रूठे किस्मत को नोंच रहा,

ना जाने और लिखा है क्या,

सोया तकदीर खरोच रहा।

वो देख रहा क्या हाल हुआ,

हाय खेती भी लगता जुआ।

कैसे जीवन उस पार लगे,

उम्मीदों से उठ रहा धुंआ।

ना जाने कैसी भूल हुई,

मेहनत सारी फजूल हुई।

जाने क्या होगा और बुरा,

हाय मिहनत ना कबूल हुई।

– अनिरुद्ध कुमार सिंह,

धनबाद, झारखंड।

 

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