आवश्यकता से अधिक, वर्षा है अतिवृष्टि।
जाने क्यों अन्याय यह, करती रहती सृष्टि।।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में, होती हाहाकार।
बेघर हो जाते कई , पानी से परिवार।।
सतत बरसता नीर जब , नदियां गहें उफान।
बाढ़ न आ जाये कहीं , घबराये इंसान।।
मनमानी की वृत्ति नित , पैदा करे प्रकोप।
प्रकृति लुटाये त्रासदी, सुविधाएं हों लोप।।
रखो प्रकृति से मित्रता, संभव तभी बचाव।
हमको संत सुजान सब , देते यही सुझाव।।
— मधु शुक्ला, सतना, मध्यप्रदेश