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द्रवित ह्रदय, अश्रु नयनों में – इंजी. अरुण कुमार जैन

 

बारह जून गुरु का दिन था, दो बजने वाले थे,

बोइंग विमान से ढाई सौ यात्री लन्दन जाने वाले थे.

कई तो मिलकर लौट रहे थे,

कितनों को मिलना था,

नेह, प्रेम, आनंद ह्रदय में,

सब के मन जी भर था.

***

वृद्ध, युवा थे, नन्हे, मुन्ने,

नव शिशु भी इनमें थे,

नई उमंगे, सपने नूतन,

सबकी आँखों में थे.

रन वे पर दौड़ा, उड़ा, बढा,

आग लगी टकराया,

हर्ष, उमंग पीर में बदली,

करुण रुदन का साया.

***

चीख, वेदना, भय, पीड़ा थी,

रोम- रोम व्याकुल था,

मृत्युमुख के सभी सामने,

मानो महाप्रलय था.

महानर्क व महाविनाश था,

पल भर में यूँ आया,

टूटी साँसो की डोर सभी,

मृत्यु साम्राज्य घिर आया.

***

माता, पिता, भाई व बहिंनें

पुत्र, मित्र घबराये,

पति, पत्नी, बच्चे, दादा, दादी,नयनन नीर बहाये.

क्रूरकाल हिंसक हाथों ने,

दमन चक्र फैलाया,

265 सभी अभागे, को काल के गाल समाया.

***

प्रश्न चिन्ह मुँह बाये कितने,

किसने यह करवाया!

आतंक वाद, मानवीय भूल,

या क्रूर काल का साया?

लाखों आँखों में नीर विपुल, सब मन व्याकुल, आकुल हैं.

कितने कितने सपने टूटे, जर्ज़र तन व मन हैं.

**

कैसा यह सन्देश भयावह,

किसने यह भेजा है,

इंद्र धनुष, नंदन कानन में, महा मृत्यु योग भेजा है.

द्रवित हृदय, अश्रु नयनों में,

महापीर है मन में,

न्याय मिले हर निरपराध को, प्रभुवर तेरे जग में।

– इंजी. अरुण कुमार जैन  (विनायक फीचर्स)

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