बरगद वृक्ष से लिपटी हुई
लताओं सी वह दिखती।
ढूँढती वो स्तंभ मजबूत
ताकि वह निश्चिंत रहती।
जड़े थी मजबूत वृक्ष की
वक्ष से उसे ही लगा रखा।
तरु लता शाखा वल्लरी
सभी तो थे उसके सखा।
वृक्ष पर जमा रखी थी
लताओं ने अपनी जड़ें।
बरगद ने भी मजबूती से
सदा रखा उसको जकड़े।
यूँ ही लगाए रखना सदा,
लता की भांति वक्ष से।
और फिर लिपटी रहूँ,
बरगद जैसे ही वृक्ष से।
– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर