भरे गड्ढे खँगाले जा रहे हैं,
दवे मुद्दे उछाले जा रहे हैं ।
कहें गद्दार जो रणबांकुरों को ,
सियासी स्वान पाले जा रहे हैं।
लगे थे घाव जिस योद्धा को अस्सी ,
उन्हीं पर नमक घाले जा रहे हैं ।
हमारे देश की ऐसी शियासत ,
गढ़े मुर्दे निकाले जा रहे हैं ।
यहाँ पर रोग नफ़रत पल रहा है,
सही उपचार टाले जा रहे हैं ।
करें कमजोर कैसे देश अपना ,
विदेशों तक रिसाले जा रहे हैं ।
पुरानी सोच में भटके उलेमा ,
नवी पर दोष डाले जा रहे हैं ।
कहे “हलधर” न पालो नाग घर में ,
सपोलों को सँभाले जा रहे हैं ।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून