neerajtimes.com – नवरात्र दो शब्दों से मिलकर बना है, नव + रात्रि = नवरात्र। लौकिक जीवन में और यहां तक कि वैज्ञानिक दृष्टि में भी रात्रि का अर्थ समझा जाता है “काल खण्ड”, “काल का एक अवयव”, किंतु “सनातन” चिंतन धारा में, अध्यात्म विद्या में रात्रि का अर्थ “दैवीय शक्ति” है, देवी है। वह कोई “काल खण्ड” या “काल” नहीं, “कालातीत” और काल की शासिका है। काल की “अधिष्ठात्री शक्ति” है, इसीलिए दैवीय है, देवी है, उपास्य है। इस देवी के आख्यान वैदिक भी है, पौराणिक भी; आध्यात्मिक भी हैं और लौकिक भी, नागर भी हैं, नितान्त देशज भी। यह श्लाघ्य, स्तुत्य हैं तो कहीं – कहीं विकृत, हिंसक और विभत्स भी। ऋग्वेद के सुप्रसिद्ध “नासदीय सूक्तम” से लेकर “वेदोक्त रात्रि सूक्तम”, अथर्ववेद के “श्रीदेव्यथशीर्षम”, तंत्रोक्त रात्रिसूक्तम” और विभिन्न मंत्रों, तंत्रों और यंत्रों में इसकी अभिव्यक्ति सर्वत्र द्रष्टव्य है। बहुआयामी लोकविख्यात इसी रात्रि शब्द में जब “नव” शब्द उपसर्ग बनकर जुड़ जाता है तब बनता है “नवरात्र”। अब नवरात्र का निहितार्थ हुआ; नवरात्र = नौ देवियां।
यदि विचार किया जाय कि इस रात्रि से नवरात्र के बीच जो कुछ भी घटित होता है, वह क्या है? वह है “परिवर्तन”। रात्रि देवी का “उषा देवी” और उषा देवी से “प्रभात”, दिवस, दिन, अंधकार का प्रकाश में परिवर्तन, दिनकर, दिनमान रूप में परिवर्तन, सर्व प्रकाशक सूर्य रूप में परिवर्तन….। रात्रि देवी का ही परिवर्तित रूप होने के कारण यह सूर्य नहीं “सूर्य देव” हैं। करुणा करके कृपालू होने के कारण जगतपालक, विश्वामित्र हैं, आदि चेतना से चेतान्वित होने के कारण चेतना (प्राण शक्ति) का आगर हैं। सूर्यदेव का ही दार्शनिक नाम “आदित्य” है जिसे जड़, चेतन सभी का “प्राण तत्व” कहा जाता है। उदित होकर यह आदित्य दशों दिशाओं में फैलकर सभी तत्वों के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करता है, प्राण ऊर्जा का संचार करता है, उन्हें चेतान्वित, अनुप्राणित करता है। उपनिषद ग्रंथ कहते हैं _ अथादित्य उदयन्यत्प्राची दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान प्राणान रश्मिषु संनिधत्ते। (प्रश्नोपनिषद 1.6) तथा सहस्र रश्मि: शतधा वर्तमान: प्राण: प्रजानामुदयत्येष सूर्य: (प्रश्नोपनिषद् 1.8) विज्ञान ने अपने अन्वेषणों से प्रमाणित किया है कि जगत और कुछ नहीं है, यह मात्र ऊर्जा और पदार्थ (मास एंड एनर्जी) का संघात है। विज्ञान जो कुछ आज कह रहा है उसके सहस्रों वर्ष पूर्व भारतीय मनीषा ने कहा था, यह अखिल ब्रह्मांड और कुछ नहीं प्राण और रयि है। प्राण का अर्थ चेतन ऊर्जा और रयि का अर्थ पदार्थ (सुषुप्त ऊर्जा) है। प्रश्नोपनिषद् का प्रथम प्रश्नोत्तर इसी की विषद व्याख्या प्रस्तुत करता है.
अध्यात्म विद्या के आलोक मे, आदित्य के प्रकाश में अबतक जो कुछ अंधेरे में अदृश्य, गुह्य, धुंध, धुंधलका था, वह कुहासा छंटने लगा। अब सबकुछ इंद्रिय गोचर हो दिखने लगा। यह परिवर्तन यत्र तत्र सर्वत्र, चराचार प्रकृति में भी स्पष्ट दिखने लगता है। रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द सभी तन्मात्रायें प्राणवान हो क्रियाशील होकर अब अनुभूत होने लगते हैं। प्रकृति भी प्रषुप्त से जाग्रत हो प्राणवान हो उठती है, रात्रि का घूंघट उठाते ही उषा रूप का मुग्धकारी सौंदर्यपान कर चिड़ियां चहचहाने लगती हैं, पुष्प मुस्कुराकर खिल उठते हैं, गुनगुनाती नदियां, कल कल कल करते झरने अपनी मनोरम शब्द ध्वनियों से गुंजित हो जाते हैं, फसलें, वनस्पतियां लहलहाकर झूम उठती हैं, जनजीवन भी गतिशील हो उठता है। रात्रि साधना के समय की गई प्रार्थना तमसो मा ज्योतिर्गमय का ही नवरात्र के रूप मे प्राकट्य है, अभिव्यक्ति है, प्रस्फुटन है; और विभिन्न त्यौहारों के रूप में उमंग-उल्लासमय प्रकटन भी –
प्रकृतिस्व च सर्वस्व गुणत्रय विभवानी।
कालरात्रि महारात्रि मोहरात्रि दारुणा।। (तंत्रोक्त रात्रिसूक्त 7)।
यहां कालरात्रि का अर्थ दीपावली, महारात्रि का अर्थ शिवरात्रि या अहोरात्रि, मोहरात्रि का अर्थ जन्माष्टमी और दारुणरात्रि का अर्थ है होली। इसके अतिरिक्त वर्ष में चार – चार नवरात्र, दो प्रकट (शारदीय, चैत्र) और दो गुप्त (आषाढ़, माघी)। इस प्रकार “रात्रि” और “नवरात्रि” का बहुत अधिक महत्व है और ये हमारे जनजीवन में बहुत गहराई तक रचे बसे हैं। साथ ही ये हमारे जीवन को परिचालित, परिवर्धित, परिवर्तित करते रहते हैं। इन परिवर्तनों को हम निम्न लिखित शीर्षकों में देख सकते हैं, समझ सकते हैं, वर्णित कर सकते हैं।
(क) भौतिक परिवर्तन या वाह्य परिवर्तन नवरात्र का सीधा सम्बन्ध प्रकृति से है और प्रत्येक नवरात्र में प्राकृति का जलवायु परिवर्तन, ऋतु परिवर्तन, मौसम परिवर्तन स्वयं ही हो जाता है। चैत्र नवरात्र के बार “ग्रीष्म ऋतु” और शारदीय नवरात्र के बाद “शरद ऋतु” की शुरुआत…। ऋतुओं के अनुसार न केवल मानव की, अपितु प्रकृति की भी, सभी प्राणियों की, वनस्पतियों की भी वेशभूषा, रहन सहन में भी अपेक्षित परिवर्तन हो जाता है। इन परिवर्तनों को वाह्य परिवर्तन या भौतिक परिवर्तन कह सकते हैं
यदि अद्वैत प्रधान “अक्षर पुरुष” से अपनी दृष्टि को वैविध्य प्रधान या संख्या प्रधान “प्रकृति” की ओर उन्मुख करें तो (9) संख्या की पूर्णता और नव शब्द की दिव्यता, दोनों की अलग अलग अपनी गहराई का पता चलता है। यहां “नव” संख्या वाचक भी है और शब्दवाचक भी। रात्र शब्द है काल वाचक (रात्रि समूह-काल विशेष का वाचक)। इस नवरात्र शब्द में संख्या और काल का अद्भुत सम्मिश्रण है। आचार्य पाणिनि इसी मत के पोषक माने जाते हैं _
नवानां रात्रीणां समाहार: नवरात्रं।
रात्रा: नहा: पुंसि संख्यापूर्वं रात्रम्।। (2/4/29)
इस प्रकार इस शब्द से जगत के सर्जन – पालनरूप “अग्नीषोमात्मकम जगत” के सिद्धान्त से इसके द्वन्द्व (मिथुन, युग्म) होने की पुष्टि होती है। नवरात्र में अखण्ड दीप जलाकर हम अपनी इस ‘नव’ संख्या पर रात्रि का जो अन्धकार, आवरण छा गया है, अप्रत्यक्षत: उसे सर्वथा हटाकर ‘विजया’ के रूप में आत्म-विजय का दीप प्रज्जवलित करना है।
शास्त्री मे मुख्यरूप से दो नवरात्र वर्णित हैं। पहला वार्षिक या वासन्तिक नवरात्र (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक और दूसरा- शारदीय नवरात्र (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक)। उक्त दोनों नवरात्रों की सर्वमान्यता और प्रमुखता भी अकारण नहीं, सकारण है। मानव जीवन की प्राणप्रद ऋतुएं मूलतः 6 होने पर भी मुख्यतः दो ही हैं –
(1) शीत ऋतु (सर्दी) –
(2) ग्रीष्म ऋतु (गर्मी) –
आश्विन से शरद् ऋतु (शीत) और चैत्र से वसन्त (ग्रीष्म)। यह भी विश्व के लिए एक मिथुन (जोड़ा) बन जाता है। एक से गेहूं (अग्नि) तो दूसरे से धान या चावल (सोम)। इस प्रकार प्रकृति माता हमें इन दोनों नवरात्रों में जीवन पोषक अन्न के अग्नै सोम (अग्नि- सोम) के युगल का सादर उपहार देती है। पोषक गुणों के कारण ही “पृथ्वी” जमीन का टुकड़ा नहीं मां है, प्रसिद्ध वैदिक “पृथ्वी सूक्त” में प्रकृति और पर्यावरण संबंधी सर्वोपयोगी अदभुत वर्ण है। जल भी पोषक होने से “वरुण देव” और पोषिका रूपा होने से “नदियां”, सरोवर भी पूज्य है, वृक्ष भी देव हैं, और यह संवेदनशील वृत्ति हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञ बनाती है, उसे स्वच्छ और स्वस्थ बनाने का भाव जगाती है। पाश्चात्य देशों की भौतिकवादी भोगवृत्ति ने प्रकृति का अकूत दोहन कर प्राकृतिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न कर दिया है। जबतक प्रकृति के प्रति संवेदनात्मक मातृत्व भाव का प्रसार नहीं होगा, यह प्रकृति अत्यन्त भयावह और विनाशक भी हो जायेगी। जनसामान्य में इस संवेदना को भारतीय चिंतन और प्रकृति उपासना ही जागृत कर सकती है। हमारे विभिन्न पर्व त्यौहार प्रकृति से गहराई तक इसलिए जुड़ पाए कि प्रकृति भी देवी स्वरूपा ही है। चारों नवारत्रियो में देवी उपासना प्रकारांतर से प्रकृति परिवर्तन का स्वागत ही है। ग्रीष्म और शरद दो प्रमुख ऋतु है। यही कारण है कि दो नवरात्रियों को बहुत प्रमुखता मिली। 1. नवगौरी या परब्रह्म श्रीराम का नवरात्र और 2. नवदुर्गा या सबकी आद्या महालक्ष्मी के नवरात्र सर्वमान्य हो गये।
नवरात्र पर्व एक खोज है (भाग 5) – डॉ जे पी तिवारी
(ख) आभ्यांतर या मानसिक परिवर्तन:
हमारी मानसिक चेतना में भी ये परिवर्तन गहरा प्रभाव डालते हैं और पूरा का पूरा व्यक्तित्व ही परिवर्तित हो जाता है। चिंतन से लेकर वेशभूषा तक, तन, मन मे आभ्यंतर परिवर्तन, अनुभूतियां होने लगती हैं। हर्ष, उल्लास, प्रसन्नता, गीत, संगीत की एकल या सामूहिक अभिव्यक्ति होती है। जनजीवन पुष्प वाटिका की भांति चहक उठता है। सुरभित होकर सुगंध बिखेरता है।
मां के रूप में विभिन्न रूपों की आराधना में साधक इतना तल्लीन हो उठता है कि प्रत्येक नारी में उसे मां का ही आभास होने लगता है, मां के शिशु रूप से पूर्ण यौवन रूप में मां का ही दिग्दर्शन उसकी दृष्टि को आध्यात्मिक रूप से इतना पवित्र और सुदृढ़ बना देता है कि वह लौकिक काम, भोग, वासनाओं की विकृतियों से सरलता से बच जाता है जबकि साधना विहीन मानव अमर्यादित होकर प्रायः भटक जाता हैं। यदि इसे विज्ञान की दृष्टि से देखें तो यह शक्ति या ऊर्जा “तरंग रूप” में गतिशील होती है। वही तरंग में “m” और “w” जैसी दोनों ही प्रकार की आकृतियां बनती हैं। इन तरंगों में कुछ ऐसी आकृति बनती है जो पूरी तरह से दृष्टा की दृष्टि भावना पर निर्भर होती है। साधक की दृष्टि इस ऊर्जा तरंग को “m” रूप में देखता है तो विकृत मानस को यह “w” रूप में दिखती है। “एम” की दृष्टि (mother) मातृत्व भाव को सृजित करती है। मातृ भाव में मन की मलीनता, कामुकता का कोई स्थान ही नहीं होता, वहां आदर, समर्पण और सेवा भाव होता है। “डब्लू” दृष्टि (wife / woman) काम, भोग भाव को उत्पन्न करती है। यही दृष्टि समाज में यौन उत्पीडन और बलात्कार जैसी घिनौने अपराध का मूल कारण हैं।
पवित्र “एम दृष्टि” की देन गीत, संगीत, नृत्य, साहित्य और विभिन्न लोक कलाएं है। इन चिंतकों ने शिव और शक्ति के युग्म को पहचाना किंतु कोई नाम, गुण, संज्ञा नहीं दे पाए। वस्तुत लौकिक वाणी के वर्णन का वह विषय ही नहीं हैं । यदि है तो संकेत और प्रतीक का विषय। महाकवि कालिदास ने शिव और शक्ति को “शब्द” और उसके “अर्थ” की भांति अपृथक, अद्वय, एकयुग्म प्रतीक बताया है _
वागर्थाविवसंपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तए।
जगत: पितरौ वंदे पार्वती परमेश्वरौ।।
कबीर ने कहा _
एक कहूं तो है नहीं दूइ कहूं तो गारी।
है जैसा तैसा रहे कहै कबीर बिचारी।।
लाली मेरे लाल की जीत देखूं तित लाल।
लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल।।
इसी प्रकार छायावादी काव्यधारा की प्रमुख स्तंभ महीयसी महादेवी वर्मा की एक दार्शनिक रचना दृष्टव्य है _
मैं पुलक हूं जो पला है कठिन प्रस्तर में…। इसमें “पुलक” क्या है? और “प्रस्तर” क्या है? इसे विस्तारित करने की आवश्यकता नहीं। यह “पुलक” ही वह आह्लादित संवेदना है जो प्रस्तर गुहा (शैल) से गुनगुनाती, मुस्कुराती सी, एक सार्थक सन्देश देती बाहरी दुनिया में प्रकट होती है। महादेवी की ही एक और रचना स्मृति में गुंजित हो रही है, यहां इसमे भी सबकुछ सुस्पष्ट है – नींद थी मेरी अचल निष्पंद कण कण में। प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पंदन में। प्रलय में मेरा पता पद चिह्न जीवन में….।
यह नींद रात्रि भी है, प्रलय भी, गुप्त भी है, गुह्य भी। जीवन इसी गुह्यता का उन्मेष, सुख, दुःख, आनन्द की अभिव्यक्ति और मौन, शांति, परमशांति की गहन निद्रा का एक चक्र है। यही भवबंधन है, जन्म और मृत्यु का चक्र भी।
विज्ञान ने इसे अपनी वैज्ञानिक शब्दावली में रात्रि को डार्क एनर्जी, डार्क मैटर जैसे शब्दों से वर्णित किया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि इस डार्क एनर्जी को विज्ञान मात्र छः प्रतिशत (6%) ही जान पाया है अभी तक, शेष के लिए अनुसंधान जारी है। विज्ञान भी अध्यात्म का अनुगमन कर रहा है। आशा की जानी चाहिए की विज्ञान भी जप पूर्णता की प्राप्ति कर लेगा तब वह भी इस डार्क एनर्जी को जड़ नहीं चेतन स्वीकार लेगा। आज गॉड पार्टिकल की खोज में उसका प्रवृत्त होना इसी का संकेत कर रहा है।
यदि हम भक्तों और संतों की बात करें तो इस प्रकार के अनेकानेक वर्णन संत साहित्य में मिल जाते है, इन संतों ने हो वैदिक, पौराणिक कनानियों, कथाओं, घटनाओं के माध्यम से संस्कृतनिष्ठ आध्यात्मिक चेतना का, सृष्टि प्रक्रिया का, विभिन्न साधना पद्धतियों का लोकभाषा की सरल शब्दावली में गुणगान कर, गुणानुवाद कर जन जन तक प्रचारित, प्रसारित किया है।
नवरात्र पर्व एक खोज है (भाग – 6) – डॉ जे पी तिवारी
(ग) दैविक परिवर्तन या आध्यात्मिक परिवर्तन:
चिति या देवी के अनन्त नाम, अनन्त रूप हैं। “श्रीदुर्गाष्टोत्तर शतनामस्तोत्रम” में इस देवी के 108 नाम रूपों का वर्णन है। श्री “अथदुर्गाद्वाशन्नाममाला” में देवी के 33 परमगुप्त भावबाधा निवारिणी नामों के जाप का उल्लेख है। इसी प्रकार स्थान – स्थान पर देवी के अन्य कई नामों का उल्लेख मिल जाता है। किंतु लोक जीवन में इस देवी शक्ति के (9) नौ रूपों की सर्वाधिक मान्यता श्रीमार्कण्डेय पुराण के एक विशिष्ट अंश (ग्रंथ) से मिली है जिसे हमलोग “श्रीदुर्गासप्तशती” के नाम से जानते हैं। “नवरात्र” देवी उपासना “शिवा” या दुर्गा शक्ति के ये नौ मानवीयकरण प्रतीक किसी न किसी विशिष्ट दैविक या आध्यात्मिक शक्ति के द्योतक हैं और इसी रूपों का विवेचन, इस लेख का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय है।
यह मानव ही है जिसने उस दिव्य शक्ति को विभिन्न रूपों में स्वीकार किया, पूजित किया और जनजीवन से जोड़ा। देवी के नौ रूपों को लोकजीवन में जिसने प्रचारित प्रसारित किया वह पावन ग्रंथ है “श्रीदुर्गासप्तशती” जहां देवी कवच महात्म्य का वर्णन करते हुए ब्रह्मा जी ने महामुनि मार्कण्डेय जी से देवी के गुप्त रूपों की स्पष्ट चर्चा इन शब्दों में की है –
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्व भूतोपकारकम।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छ्रीणुष्व महामुने।।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघंटेति कूषमांडेति चतुर्थकम।।
पंचम स्कंदमातेति षष्ठम कात्यायनीति च।
सप्तम कालरात्रीति महागौरीति चाष्टकम।।
नवम सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्राह्मणेव महात्मना।।
नवरात्र पर्व एक खोज है (भाग 7) – डॉ जे पी तिवारी
देवी के (9) रूपों के चयन का रहस्य
अब यहां एक प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि जब देवी मां के 108, 33 तथा अन्यान्य नामों का उल्लेख और विषद वर्णन है तो 9 की ही संख्या पर इतना प्रबल आग्रह, स्वीकृति, मान्यता, अटूट विश्वास क्यों? इसके उत्तर के लिए हमे पुनः देवी की स्वीकारोक्ति को ही आधार वाक्य बनाना पड़ेगा, जहां देवी ने कहा है -अहं ब्रह्म स्वरूपिणी। वह अक्षर ब्रह्म क्या है? यह प्रश्न दार्शनिक / आध्यात्मिक है तो उत्तर के लिए भी हमें दार्शनिक ग्रंथों की ही शरण में जाना पड़ेगा।
मांडूक्य उपनिषद में ब्रह्म की परिभाषा, स्वरूप लक्षण मिलता है, जहां कहा गया है कि वह (तत्) “जो अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण, और चक्षु, श्रोत्र, हस्त, पाद से रहित है; तथा जो नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यंत सूक्ष्म और अव्यय है। जो सम्पूर्ण महाभूतों का कारण है, वही अक्षर ब्रह्म है और उसे विवेकवान प्रज्ञा पुरुष सब और परिव्याप्त देखते है” ( मांडूक्य 1.6)। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी संस्कृत मंत्र का भावानुवाद “मानस” में साधारण लोकभाषा में किया है – बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ विधि नाना।। आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बाणी बकता बड़ जोगी।। तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रह घ्राण बिनु बास असेषा।। (मानस बा.का. 118) इस भाषा शब्दावली से ऐसा भ्रम हो सकता है कि “ब्रह्म” क्या पुलिंग है? ऐसे ही भ्रम निवारण के लिए श्वेताश्वर उपनिषद यदि विधेयात्मक शब्दावली में कहता है – “तू ही स्त्री है, तू ही पुरुष है, तू ही कुमार या कुमारी है, तू ही वृद्ध होकर दण्ड के सहारे चलता है तथा तू ही प्रपंच रूप से उत्पन्न होने पर अनेक रूप, सर्व रूप, अनन्त रूप हो जाता है” (श्वेताश्वतर उप. 4.3)। तो वहीं निषात्मक शैली में भी कहता है में विलक्षण हूं, बिलक्षणा हूं, मेरा कोई लक्षण नहीं है – नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसक: (श्वेताश्वर उप 5.10)। अर्थात न यह स्त्री है, न पुरुष है, और न नपुंसक ही है। वह एक है और स्वयं की अनेक होकर उसीमे परिव्याप्त हो गया है, वह सूक्ष्मतम परमाणु से भी परमाणु और महानतम से भी महान है (श्वेताश्वर उप. 3.20)।
वस्तुत केवल ब्रह्म ही पूर्ण है, दूसरा कोई भी नहीं। इसलिए उपनिषद दर्शन को पूर्णता का दर्शन भी कहा जाता है। क्या है यह ब्रह्म की पूर्णता का दर्शन? और क्यों कहा जाता है इसे पूर्णता का दर्शन? आइये आज इसे समझने का प्रयास करते हैं। इसके लिए श्वेताश्वर उपनिषद् के एक मन्त्र को यदि हम प्रतिनिधि और बीजमंत्र के रूप में स्वीकार कर सकें तो यह पूर्णता अपने दिव्य रूप में वहाँ प्रकट होता है, समझने और समझाने दोनों ही दृष्टि से यह सर्वथा उत्तम है। यह मन्त्र है –
एको देवः सर्वर्भूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्व भूताधिवासः साक्षी चेता केवलः निर्गुणश्च’ ।। – (6.11)
अर्थात, सभी प्राणियों में स्थित देव (शिव या शिवा) एक है, वही सर्व व्यापक. समस्त भूतों का अंतरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ साक्षी, परम चैतन्य, परमशुद्ध और निर्गुण है। यह तो हुआ इस मन्त्र का शब्दार्थ। परन्तु यह मन्त्र है बहुत ही रहस्यपूर्ण, …. आइये इसे दूसरे दृष्टिकोण से देखें, संख्याओं में विभाजित कर गणितीय रूप में देखें –
1 – एको देवः 2 – सर्वर्भूतेषु गूढः 3 – सर्वव्यापी 4 – सर्वभूतान्तरात्मा 5 – कर्माध्यक्षः
6 – सर्व भूताधिवासः 7 – साक्षी 8 – चेता 9 – केवलः 10 – निर्गुणश्च
इस मन्त्र में हम देख सकते हैं कि पूरे मन्त्र को ‘1’ से ’10’ तक की संख्याओ में आसानी से विभाजित किया जा सकता है।
(1) ब्रह्म तत्त्व की एकता का प्रतीक है।
(2 ) उसकी गूढता और जटिलता का सूचक।
(3) सर्व्यापकता का सूचक है।
(4) ‘अणु’ की पहचान के द्वारा ‘विभु ‘, ‘विराट’ और ‘भूमा’ स्वरुप को पहचानने की ज्ञानात्मक / सध्नानात्मक दृष्टि है।
(5) आस्तिकों और नैतिक व्यक्तित्व वाले का संबल है, उसके न्यायी प्रकृति के कारण ही व्यक्ति सत्य के लिए अपने ‘स्व’, अपने अहं को बलिदान करने की प्रेरणा पता है।
(6) वह परमात्मा केवल मानव, केवल चेतन, केवल जड़ तक ही सीमित नहीं है। वह कण -कण में परिव्याप्त है, यह दृष्टि केवल प्रकृति के साथ भावनात्मक और पारिवारिक सम्बन्ध जो दती है, प्राकृतिक वस्तुओं के साथ मधुर रिश्ते स्थापित करती है, विश्ववन्धुत्व की भावना विकसित करने के लिए यहीं से ऊर्जा मिलती है। यह दृष्टि ग्रह -नक्षत्रो, नदी-पहाड़ से लेकर वनस्पतियों तक से रिश्ते की परिकल्पना की है। नाम और रूप तो अलग-अलग है परन्तु, परन्तु तत्वतः नहीं। संतों ने इसीलिए गाया है –
आपे रसिया आप रस आपे रावनहार।
आपे होवे चोलदा आपे सेज भतार ।।
(7) वह द्रष्टा है, समदर्शी है, इसी गुणों के कारण वह परमन्यायी है. इस लोक में न्याय न मिल पाने पर भी यह विश्वास भक्त को न्याय पथ से नहीं डिगा सकता क्योकि यह विश्वास दृढ है कि यदि यहाँ न्याय नहीं मिला तो क्या हुआ. वहाँ तो मिलेगा. यदि यह विश्वास टूट जाय तो सोचिये क्या होगा? जब इस देश में कोई कानून को कितना मानता है तो क्या नैतिकता, ईमानदारी, जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों का कोई महत्व रह जाएगा ?
(8) वह परम चैतन्य है, चेतन होने के कारण ही अपने भक्तों की आर्द्र पुकार सुन लेता है,यह गरीबो, और निर्बलों का एक मात्र बल है,… शक्ति है … संबल है..। इसी साहस के बल पर एक चींटी भी विशालकाय हाथी से लड़ने और उसे परस्त करने का हौसला पाता है। यह विश्वास औए आस्था का ही बल है जो अग्निसुरक्षा कवचधारी, वरदान प्राप्त होलिका को तो भस्म कर देता है लेकिन प्रह्लाद का विश्वास विजयी होता है. यह वह श्वास-प्रश्वास है जिसमे लौह का दम्भ भी लाल पानी बन जाता है। उसका ठोसपना, उसका दम्भ सब गल जाता है।
आज का मानव टुकडे-टुकडे देखने का अभ्यस्त हो गया है समग्रता में वह देख ही नहीं पाता. जिस दिन समग्र दृष्टि आ जायेगी वह विवेकानंद, अरविंदो और आइन्स्टीन की तरह आध्यात्मिक वैज्ञानिक (Philosopher of science) बन जाएगा। ईश्वर के स्तित्व को नकारते देखा-सुना गया है परन्तु क्या कोई सत्य को नकार सकता है? सत्य की परिभाषा क्या है? ‘परम सत्यम, सत्यम परम’ अर्थात जो सत्य है वही परम है और जो परम है वही एक मात्र सत्य है। जो काल बाधित न हो, जो कभी परिवर्तित न हो, सदा एक रस हो। वही तो सत्य है। सत्य ईश्वर का समानार्थी नहीं पर्यायवाची है। आखिर सत्य तो माननेवाला भला ब्रह्म के स्तित्व को कैसे नकार सकता है? आज के युग में ऐसी अलौकिक शक्ति आज केवल राजनीतिक व्यक्तियों के पास है। उसे ही यह अधिकार है क़ि इस ‘सत्य’ में जब चाहे ‘अ’ जोड़ दे, जब चाहे ‘अ’ घटा दे ……।
(9) इन संख्याओं में एक अंक की सबसे बड़ी संख्या ‘9’ है और यह संख्या ‘केवल’ है। केवल वही है- दूसरा नहीं। और दसवी संख्या निर्गुण है जिसका गुणन नहीं हो सकता, वह ‘शून्य’ है. शून्य स्वतः निर्गुण है ऊपर वाले ‘1’ पर इस निर्गुण शून्य को रख देने से ’10’ संख्या स्वतः बन जाती है.
(10) इस ’10’ में सम्मिलित ‘1’ ब्रह्म और आत्मा दोनों का प्रतिधित्व करता है( वस्तुत दोनों एक ही हैं भी)। इसमें ’10’ नाम-रूपमय सृष्टि का वाचक है. इस ‘1’ के अभाव में समस्त सृष्टि ‘o’ शून्य है। मृतप्राय है, प्रलायावास्था में है, मूल्यहीन है तथा ‘1’ के साथ रहने पर वही मूल्यवान है, सजीव है। ‘9’ अंक केवल है, पूर्ण है, सम्पूर्ण है। अतएव ‘9’ अंक जहां भी रहता है, अपने ‘केवली’ स्वरुप का परित्याग कभी नहीं करता. अतः केवल है, अतः केवल वही रहेगा जो वस्तुतः है। तत्त्वतः है, जो ‘actual’ ‘ और ‘factual’ दोनों है । इस परम तत्त्व को पहचानना होगा और जो इसे पहचानेगा वही ज्ञानी और पंडित कहलायेगा, कोई दूसरा नहीं. – निर्गुण सरगुन आपे सोई, तत पछाड़े सो पंडित होई…
उदाहराणार्थ : 9 के गुणनफल का योग सदैव 9 ही होगा.
9 x 1 = 9
9 x 2 = 18, (1 + 8 = 9 )
9 x 3 = 27, (2 + 7 = 9 )
9 x 4 = 36, (3 + 6 = 9 )
………………………………….
इतना ही नहीं योग (+) और घटाव (-) की क्रिया में भी यह ९ अपने स्वरुप का परित्याग कभी नहीं करता। आइये देखें कैसे –
(अ) – 9 + 8 + 7 + 6 + 5 + 4 + 3 + 2 + 1
योग = 45, (4 + 5 = 9)
(आ) – 9 8 7 6 5 4 3 2 1 (45) = (9)
(-) 1 2 3 4 5 6 7 8 9 (45)। = (9)
——————————–
= 8 6 4 1 9 7 5 3 2 = (45)। = (9)
…………………………..
अतः कह सकते है: (9 – 9 = 9)
या पूर्ण – पूर्ण = पूर्ण
इसीलिए उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्म परमपूर्ण है, वह (अदः) और यह (इदं), ‘that’ और ‘this’, ‘he’ और ‘she’, दोनों में ही वह इकाई रूप में सामान भाव से है। परमतत्त्व पूर्ण, परिपूर्ण है, सम्पूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को घटाने पर भी सम्पूर्ण ही शेष बचता है। उसमे रंच मात्र भी न्यूनता नहीं आने पाती, इसलिए उपनिषद् कहते हैं –
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
दुर्गासप्तशती में “देवी” को नित्य कहा गया है। देवी नित्यस्वरूपा हैं, यह संपूर्ण जगत
[1:55 pm, 31/03/2025] Kavi Dr J P Tiwari: यह वृहत चिंतन पाठकों की सुविधा हेतु क्रमशः 9 भागों में विभक्त किया गया है।