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कैसे चल पाउँ…? – अनुराधा पांडेय

चंद पग था साथ चलना,

और वो तुम कर न पाये।

कोटिश: सौगंध तुमने ,

खा लिए थे प्रेम पथ में।

किन्तु उस गंतव्य तक आरूढ

रह पाये न रथ में।

जी लिए कुछ हर्ष के क्षण-

साथ तुम पर मर न पाये ।

और वो तुम–

 

जब मिले थे तो बहुत थे,

घाव दोनों ही हृदय में।

और सोचा था मिलेंगे,

चैन द्वय के चिर विलय में।

किन्तु रहकर साथ कुछ क्षण,

व्रण उभय के भर न पाये।

और वो तुम—

– अनुराधा पांडेय, द्वारिका, दिल्ली

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