मनोरंजन

प्रियवर अति विशेष हो – सविता मीरा

न जाने वह यह सब

कर लेती थी कैसे?

तंगी भरे दिनों में भी

रख कंधे पर हाथ

निकाल देती थी पैसे|

देखता रहता अपपलक

शांत सौम्य थोड़ी कड़क,

पल्लू को खोंस  कमर  में

देखती जाती दूर तलक|

चँद दिनों में ही कैसे

गह लिया मुझको ऐसे

कैसे कर लेती हो तुम सखे

जैसे धमनी में रक्त बहे|

इतना समर्पण ऐसा अर्पण

सीमित संसाधनों मे  भी

गृहस्थ का पूरा संचालन

अरु संचित भी कर लेती धन?

दौड़ा फिर रसोई घर

थी वो पसीने से तर बतर,

चूमा  उसके मस्तक को

उसने लिया बाँहों में भर,

फिर फफक  फफक कर,

गोद में उसके सर रखकर

मन हुआ हल्का ताजा तरीन

निकला जैसे इंद्रधनुष रंगीन

ऐसा संचालन, ऐसा निवेश

हर महिला होती अति  विशेष|

हर महिला होती अति विशेष|

– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

Related posts

चतुर्मास की महिमा – टी.एस. शान्ति

newsadmin

जाम से रेंगते शहर – प्रियंका सौरभ

newsadmin

श्रेष्ठ मनुज – रश्मि मृदुलिका

newsadmin

Leave a Comment